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ऑर्केस्ट्रा से बिल्कुल अलग है बिहार का झुमरी नृत्य, ठेठ देहाती अंदाज में महिलाएं करती हैं गोल घेरा बनाकर डांस

Published: Tue, 29 Sep 2026 04:33 PM (IST)Updated: Wed, 30 Sep 2026 10:19 AM (IST)

बिहार की लोक संस्कृति में झुमरी नृत्य की खास जगह है। ये नृत्य गांव की महिलाएं करती हैं।

बिहार का मशहूर लोक नृत्य है झुमरी (AI Generated Image)

बिहार का मशहूर लोक नृत्य है झुमरी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के लोक नृत्यों की बात करें, तो झुमरी का नाम लेना जरूरी है। इसे बिहार का गरबा भी कहा जाता है। किसी उत्सव या त्योहार के मौके पर पर गांव में महिलाएं ये नृत्य जरूर करती हैं।

झुमरी नृत्य सिर्फ मनोरंजन का एक जरिया नहीं है, बल्कि इसमें बिहार की असली संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। आइए जानें क्यों किया जाता है झुमरी नृत्य और ये इतना खास क्यों है। 

झुमरी नृत्य का इतिहास क्या है?

झुमरी की जड़ें बिहार की कृषि और ग्रामीण जीवन से जुड़ी है। ये नृत्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है और माना जाता है कि ये सदियों पुराना है। हालांकि, इसकी शुरुआत किसने की और कब इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। मूल रूप से ये नृत्य गुजरात के गरबा से काफी मिलता-जुलता है, क्योंकि इसे भी गोल घेरे में घूमते हुए किया जाता है। इसलिए इसे बिहार का गरबा भी कहा जाता है। मिथिला और उसके आस-पास के क्षेत्रों में ये नृत्य हर मांगलिव अवसर और त्योहारों पर ये खास नृत्य किया जाता है।

क्यों किया जाता है झुमरी?

झुमरी नृत्य जीवन के आनंद, उत्सव और प्रकृति के बदलों रूपों का जश्न मनाने के लिए किया जाता है। मौसम बदलने जैसे- बसंत के आगमन पर प्रकृति की सुंदरता और खुशी को जाहिर करने के लिए जाहिर किया जाता है। इसके अलावा, पककर तैयार हुई फसल की कटाई के मौके पर भी महिलाएं झुमरी नृत्य करती हैं।  

झुमरी नृत्य की खासियत क्या है?

झुमरी नृत्य की खासियत इसकी प्रस्तुति के ढंग में नजर आती है। इस नृत्य में प्रकृति की सुंदरता, प्रेम, विरह और सामुदायिक जुड़ाव जैसी चीजों को पेश किया जाता है। 

इस नृत्य के लिए महिलाएं रंग-बिरंगी साड़ियां और पारंपरिक गहने पहनती हैं। वहीं पुरुष धोती-कुर्ता और गमछा पहनते हैं। 

कैसे किया जाता है झुमरी नृत्य?

झुमरी नृत्य के लिए महिलाएं एक गोल घेरे में खेड़ी होती हैं और एक दूसरे का हाथ पकड़कर तालियों की ताल के साथ गोल घूमते हुए नृत्य करती हैं। ढोल, मंजीरा या झांज जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर ये नृत्य किया जाता है। इसमें हाथों और पैरों की चाल पर खास ध्यान दिया जाता है।