बिलिंग काउंटर पर चॉकलेट-टॉफी रखकर कैसे खाली की जाती है आपकी जेब? जानिए सुपरमार्केट का 'इम्पल्स बाइंग' गेम
सुपरमार्केट में बिलिंग काउंटर पर रखी चॉकलेट और टॉफी जैसी छोटी चीजें ग्राहकों को 'इम्पल्स बाइंग' के लिए प्रेरित करती हैं। ...और पढ़ें

बिलिंग काउंटर पर रखी टॉफियां कैसे खाली करवा लेती हैं आपकी जेब? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपके साथ भी अक्सर ऐसा होता है... आप घर से एक लंबी-चौड़ी लिस्ट लेकर सुपरमार्केट पहुंचते हैं। राशन, सब्जियां, साबुन-सर्फ, सबकुछ बड़ी समझदारी से अपनी ट्रॉली में भरते हैं और फिर एक विजेता की तरह बिलिंग काउंटर की लाइन में जा लगते हैं। आपको लगता है कि आपकी शॉपिंग खत्म हो गई, लेकिन ठहरिए... सुपरमार्केट का असली 'दिमागी खेल' तो बस यहीं से शुरू होता है।
क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि बिलिंग काउंटर के ठीक बगल में हमेशा चॉकलेट, रंग-बिरंगी टॉफियां, च्युइंग गम, मिंट, बैटरी या रेजर जैसी छोटी-छोटी चीजें ही क्यों सजी रहती हैं, जो आपको अपनी तरफ ललचाती हैं?
जी हां, यह कोई इत्तेफाक या जगह की कमी नहीं है। यह जाते-जाते आपकी जेब ढीली करवाने की एक ऐसी सोची-समझी मनोवैज्ञानिक रणनीति है, जिसमें हम और आप अक्सर न चाहते हुए भी फंस ही जाते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
क्या आप भी करते हैं 'इम्पल्स बाइंग'?
मार्केटिंग की भाषा में इसे 'इम्पल्स बाइंग' यानी बिना सोचे-समझे अचानक कुछ खरीदने की इच्छा कहा जाता है। दरअसल, जब आप पूरे सुपरमार्केट में घूम-घूमकर खरीदारी करते हैं, तो आपका दिमाग थक जाता है। कौन-सा ब्रांड अच्छा है, कौन-सा सस्ता है- यह सब तय करते-करते आपके दिमाग की फैसले लेने की ताकत कमजोर पड़ जाती है।
ऐसे में, जब आप काउंटर पर लाइन में खड़े होकर बोर हो रहे होते हैं, तो वहां रखी ₹10 या ₹20 की चमचमाती चॉकलेट आपको अपनी तरफ खींचती है। आपका थका हुआ दिमाग तुरंत कहता है, "इतनी शॉपिंग कर ही ली है, तो एक ₹10 की चॉकलेट में क्या हर्ज है?" और आप उसे उठाकर अपनी टोकरी में डाल लेते हैं।
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इस खेल का दूसरा सबसे बड़ा निशाना होते हैं आपके बच्चे। इन चॉकलेट्स को बिल्कुल उसी ऊंचाई पर रखा जाता है, जहां तक बच्चों के हाथ और नजरें आसानी से पहुंच सकें। जब तक आप बिल बनवाने और पैसे निकालने में बिजी होते हैं, बच्चा कोई न कोई चीज पकड़ कर जिद करने लगता है।
पीछे खड़ी लंबी लाइन और भीड़ के सामने बच्चे से बहस करने से बचने के लिए, माता-पिता चुपचाप उस चीज का बिल भी बनवा लेते हैं। हमें लगता है कि ₹3000 के बिल में ₹10-20 जुड़ भी गए तो क्या फर्क पड़ता है, लेकिन यही छोटे-छोटे रुपये मिलकर सुपरमार्केट के लिए करोड़ों का एक्स्ट्रा मुनाफा बन जाते हैं।