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    ऑफिस में 8 घंटे ही क्यों करना पड़ता है काम? 9 to 5 की इस जॉब के पीछे छिपी है लंबी कहानी

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 05:56 PM (IST)

    आज के समय में जब हम किसी कंपनी में नौकरी शुरू करते हैं, तो 8 घंटे की ड्यूटी, एक्स्ट्रा काम के लिए ओवरटाइम और महिलाओं के लिए मैटरनिटी लीव जैसी बातें बह ...और पढ़ें

    ना 6 घंटे, ना 10 घंटे... आखिर 8 घंटे ही क्यों तय हुआ काम का समय? (Image Source: AI-Generated)

    ना 6 घंटे, ना 10 घंटे... आखिर 8 घंटे ही क्यों तय हुआ काम का समय? (Image Source: AI-Generated)

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल हम अक्सर मजदूरों के हक, ओवरटाइम, छुट्टियों और न्यूनतम वेतन को लेकर बहस सुनते हैं। हम सभी के लिए 8 घंटे की नौकरी एक बेहद आम बात बन चुकी है, लेकिन क्या आपके दिमाग में कभी यह सवाल आया है कि काम का समय सिर्फ 8 घंटे ही क्यों तय किया गया? इसे 6 या 10 घंटे क्यों नहीं रखा गया?

    इतिहास की किताबों में हम राजाओं की कहानियों और आजादी के किस्सों को तो खूब चाव से पढ़ते हैं, लेकिन हमारी रोजमर्रा की नौकरी और जिंदगी को आसान बनाने वाले नियम किसने बनाए, इस पर शायद ही कोई बात करता है। आइए, विस्तार से इस बारे में जानते हैं।

    History of the 8 Hour Workday

    (Image Source: AI-Generated)

    वायसराय के हाथों में थी पूरी कमान

    ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की पूरी कमान ब्रिटेन के हाथों में थी और यहां का सर्वोच्च अधिकारी 'वायसराय' कहलाता था। उस दौर के वायसराय की ताकत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उसके पास आज के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों की मिली-जुली शक्तियां हुआ करती थीं। आज की तारीख में जिसे हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं, वो उस वक्त 'वायसराय हाउस' था।

    पूरे देश का प्रशासन चलाने के लिए वायसराय के पास एक 'एग्जीक्यूटिव काउंसिल' थी। इस काउंसिल में रक्षा, कानून, वित्त और श्रम जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग थे। इसके सदस्य बिल्कुल आज के कैबिनेट मंत्रियों की तरह काम करते थे और देश के सभी बड़े फैसले इसी परिषद में लिए जाते थे।

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    भारतीय मजदूरों ने रोक दिया था अंग्रेजों का चक्का

    साल 1939 की बात है, जब दूसरा विश्व युद्ध पूरी तरह भड़क चुका था। उस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था ब्रिटेन के लिए एक बहुत बड़ा सहारा बन गई थी। सैनिकों से लेकर हथियारों तक की पूरी सप्लाई भारत से ही हो रही थी। इसका सीधा और भारी दबाव देश की फैक्ट्रियों और खदानों पर पड़ा।

    परिणाम यह हुआ कि उत्पादन बढ़ाने के चक्कर में मजदूरों से 12 से 14 घंटे तक लगातार काम कराया जाने लगा। जब हालात बर्दाश्त से बाहर हो गए, तो कामगारों ने हड़तालें शुरू कर दीं। ब्रिटिश सरकार के लिए उत्पादन चालू रखना मजबूरी थी। इसी समस्या को सुलझाने के लिए, साल 1942 में वायसराय की काउंसिल में 'लेबर विभाग' का जिम्मा संभालने के लिए एक नए सदस्य की एंट्री हुई।

    यहीं से पैदा हुआ 8 घंटे का नियम और 'ओवरटाइम'

    इस नए लेबर सदस्य ने काउंसिल में एक बहुत ही दूरदर्शी और ऐतिहासिक सुझाव रखा। उनका स्पष्ट मानना था कि कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक सेहत का ध्यान रखे बिना कोई भी अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। उस दौर में काम के घंटों की कोई लिमिट नहीं होती थी।

    उन्होंने यह प्रस्ताव पास करवाया कि:

    • एक दिन में अधिकतम काम 8 घंटे ही होगा।
    • एक हफ्ते में काम की सीमा 48 घंटे होगी।

    सबसे मजेदार बात यह है कि 'ओवरटाइम' का जन्म भी यहीं से हुआ। जब तक काम का कोई समय ही फिक्स नहीं था, तब तक ओवरटाइम का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था।

    origin of 8 hour work shift

    (Image Source: AI-Generated)

    सैलरी, छुट्टियां और महिलाओं को राहत

    आज हम जो वीक-ऑफ, पेड लीव, सिक लीव और कैजुअल लीव का आराम उठाते हैं, वह उसी नई व्यवस्था का हिस्सा था। इससे पहले अगर कोई कर्मचारी छुट्टी लेता था, तो सीधे उसकी दिहाड़ी काट ली जाती थी। इतना ही नहीं, 'न्यूनतम वेतन' का भी कोई नियम नहीं था; मालिक अपनी मर्जी से जितना कम चाहे, उतना वेतन देते थे। इस मनमानी पर रोक भी इसी दौर में लगी।

    महिलाओं के लिए तो हालात और भी बुरे थे। गर्भवती होने पर उन्हें या तो नौकरी से हाथ धोना पड़ता था या बिना सैलरी के छुट्टी लेनी पड़ती थी। हालांकि, 1928 में बॉम्बे प्रांत में 'मैटरनिटी लीव' की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन बाद में इसी आर्थिक और सामाजिक विजन के तहत इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में काम किया गया।

    कौन थे वो महान अर्थशास्त्री?

    ये सभी क्रांतिकारी बदलाव जिस महान व्यक्ति की सोच का नतीजा थे, उनका जन्म 14 अप्रैल को हुआ था। हम बात कर रहे हैं- डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की।

    राजनीति के शोर ने अक्सर उन्हें केवल एक 'दलित नेता' या 'संविधान निर्माता' के खांचे में फिट कर दिया है, जबकि उनकी शख्सियत इससे कहीं अधिक विशाल थी। जी हां, उनकी आर्थिक समझ इतनी जबरदस्त थी कि रुपये और मौद्रिक नीतियों पर उनके द्वारा की गई रिसर्च का सीधा असर आज भी भारतीय रिजर्व बैंक की कार्यप्रणाली में देखने को मिलता है।

    हमारी जिंदगी पर उनका एहसान

    डॉ. आंबेडकर सिर्फ एक वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे देश के रोल मॉडल हैं। आज आप चाहे जो भी हों- किसी फैक्ट्री में पसीना बहाने वाले मजदूर हों, सरकारी कर्मचारी हों, प्राइवेट कंपनी के मैनेजर हों या किसी सॉफ्टवेयर कंपनी में कोडिंग करने वाले इंजीनियर... अगर आप आज 8 घंटे की शिफ्ट पूरी करने के बाद सुकून से अपने सिस्टम को 'लॉग-आउट' कर घर जा पाते हैं, तो यह सीधे तौर पर उसी महापुरुष की महान देन है।

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