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Gen-Z आंदोलन में गूंजी फैज की 47 साल पुरानी नज्म, कभी पाकिस्तानी तानाशाह के खिलाफ लिखी गई थी ये कविता

Published: Mon, 27 Jul 2026 04:50 PM (IST)Updated: Tue, 28 Jul 2026 02:16 PM (IST)

जंतर-मंतर पर CJP के प्रोटेस्ट में फैज अहमद फैज की एक नज्म खूब वायरल हुई, जिसके बोल हैं- 'हम देखेंगे...'।

फैज अहमद फैज की नज्म है 'हम देखेंगे...' (AI Generated Image)

फैज अहमद फैज की नज्म है 'हम देखेंगे...' (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP और जेन-जी का प्रोटेस्ट भले ही खत्म हो चुका है, लेकिन सोशल मीडिया पर अभी भी इनकी वीडियो खूब शेयर की जा रही हैं। इस प्रोटेस्ट के दौरान फैज अहमद फैज की एक नज्म आंदोलन के दौरान कई लोगों की जुबां पर रही। 

ये नज्म और कोई नहीं, हम देखेंगे... है। सोशल मीडिया पर भी फोटोज और वीडियोज के साथ इस नज्म को लगाकर खूब शेयर किया गया, लेकिन क्या आप जानते हैं भारत में गाई गई ये नज्म पाकिस्तान में लिखी गई थी और इस नज्म में कहा क्या जा रहा है? आइए जानें फैज अहमद फैज की इस मशहूर नज्म हम देखेंगे के बारे में।    

क्यों लिखी थी फैज ने ये नज्म?

फैज हमेशा ही क्रांति और प्रतिरोध की सबसे बुलंद आवाजों में से एक रहे। ये नज्म फैज ने पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के खिलाफ लिखी थी। दरअसल, साल 1977 में जिया-उल-हक ने पाकिस्तान का तख्ता पलट करके सत्ता पर कब्जा कर लिया।

इसी तानाशाह के खिलाफ आवाज उठाने के लिए साल 1979 में फैज ने अपनी कलम से हम देखेंगे लिखा। अपनी इस नज्म से उन्होंने तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के शासन के खिलाफ प्रतिरोध जताया और ये विश्वास दिखाया कि जुल्मों का ये दौर भी खत्म होगा। 

क्या कहती है ये नज्म?

ये नज्म कहती है कि तानाशाह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, लेकिन एक दिन आएगा जब उनका तख्त गिरा दिया जाएगा और सिर्फ जनता का शासन रहेगा। यह नज्म सिर्फ एक तानाशाह के खिलाफ विरोध नहीं था। इसमें लोगों को नई उम्मीद भी दी गई थी कि एक दिन आएगा, जब आम जनता इस जुल्मों के राज से आजाद होगी और तब सिर्फ उसका राज होगा। 

कौन थे फैज अहमद फैज?

फैज अहमद फैज बीसवीं सदी के सबसे बेहतरीन उर्दू कवियों और शायरों में से एक थे। शायर होने के साथ-साथ वो एक पत्रकार, सेना में अधिकारी, अध्यापक और वामपंथी विचारक भी थे। उनका जन्म तब के अविभाजित भारत के पंजाब के सियालकोट में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में है। फैज ने अरबी और अंग्रेजी में एम.ए. किया था। फैज वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और उन्होंने उर्दू शायरी में राजनीति को जोड़ा, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। 

तानाशाहों का विरोध करने के लिए उन्हें कई साल जेल में बिताने पड़े और देशनिकाला भी सहना पड़ा, लेकिन अपनी नज्मों और शायरियों से वे क्रांति करते रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे शांति आंदोलन के लिए जाने गए और 1962 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  

आज भी क्यों पढ़े जाते हैं फैज?

फैज की शायरी दशकों पुरानी है, लेकिन आज की पीढ़ी इनसे सीधे कनेक्ट होती है। फैज ने अपनी शायरी और नज्में पाकिस्तान की राजनीति पर लिखी थी, लेकिन दुनिया में कभी भी अन्याय और असमानता की मांग कर रहे युवा इन नज्मों से सीधा कनेक्ट करते हैं।

फैज की नज्में दमनकारी शासन के खिलाफ आवाज उठाने के साथ-साथ उम्मीद और बदलाव का भरोसा भी देती है। इसलिए लोग आज भी अपनी बोलने की आजादी बयां करने के लिए फैज की नज्में बोल के लब आजाद हैं तेरे और हम देखेंगे का इस्तेमाल करते हैं।


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