ऋषिकेश नहीं, बंगाल में रची गई थी आधुनिक योग की नींव! विवेकानंद से लेकर क्रांतिकारियों तक की अनसुनी कहानी
बंगाल की धरती, जहां कभी तांत्रिक रहस्यवाद और सशस्त्र क्रांति के लिए श्वासों को साधा गया था, इस बार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के मुख्य वैश्विक मंच के ...और पढ़ें

दिलचस्प है योग का बंगाल से जुड़ा इतिहास (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जब भी योग का नाम आता है, तो मन में ऋषिकेश के गंगा घाट या हिमालय की बर्फीली कंदराओं की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन, योग की आंतरिक चेतना में अग्नि फूंकने और उसे एक उग्र, विद्रोही तथा वैश्विक स्वरूप देने में बंगाल का अद्वितीय योगदान रहा है।
यह महज संयोग नहीं है कि इस वर्ष, आज 21 जून 2026 को 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का मुख्य राष्ट्रीय आयोजन बंगाल की राजधानी कोलकाता में हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं हुगली के करीब कोलकाता की ऐतिहासिक रेड रोड पर हजारों योग साधकों के साथ इस वैश्विक आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।
इस वर्ष की आधिकारिक थीम स्वस्थ दीर्घायु के लिए योग रखी गई है, जो शारीरिक सुदृढ़ता के साथ-साथ मानसिक और आंतरिक कुशलता को रेखांकित करती है।
गूढ़ साधना का इतिहास
बंगाल में योग का इतिहास शारीरिक मुद्राओं (आसनों) से कहीं आगे, तंत्र और गूढ़ साधना के रूप में मिलता है। आठवीं शताब्दी के वज्रयान बौद्ध भिक्षुओं लुइपा और सरह द्वारा रचित 'चर्यापद' के रहस्यमयी श्लोकों में काया साधना का विस्तृत विवरण मिलता है।
इन प्राचीन भिक्षुओं ने सिखाया था कि मोक्ष बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि श्वास और शरीर के भीतर है। इसके बाद नाथ संप्रदाय के मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ जैसे योगियों ने हठयोग को लोक-संस्कृति में घोला। बंगाल की इस आदि-यौगिक संस्कृति ने शरीर को केवल हाड़-मांस का ढांचा नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को जाग्रत करने का एक पवित्र माध्यम माना।
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राष्ट्रवाद का प्रखर प्रशिक्षण
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल में योग का एक ऐसा रूप सामने आया, जिसकी कल्पना प्राचीन ऋषियों ने भी नहीं की होगी। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की तैयारी कर रहे संगठन 'अनुशीलन समिति' और 'युगांतर दल' ने योग को राष्ट्रवाद का हथियार बनाया।अरविंद घोष और उनके भाई बारींद्र कुमार घोष जैसे महान राष्ट्रवादियों ने युवाओं के लिए व्यायामशालाओं और अखाड़ों का एक गुप्त नेटवर्क तैयार किया।
इन अखाड़ों में लाठी-खेला और कुश्ती के साथ-साथ प्राणायाम और ध्यान अनिवार्य था। क्रांतिकारियों का मानना था कि किसी गुप्त मिशन या बम कांड जैसी कठिन परिस्थितियों में ट्रिगर दबाने से पहले मन का शांत और एकाग्र होना जरूरी है और यह मानसिक नियंत्रण केवल प्राणायाम से ही आ सकता है। प्रसंगवश, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार भी पूर्व में अनुशीलन समिति के सदस्य थे।
स्वतंत्रता संग्राम के इस दौर में भारत माता की सेवा ही सर्वोच्च 'कर्मयोग' बन गई थी। बाद में अरविंद घोष ने श्री अरविंद के व्यक्तित्व में रूपांतरित होकर इस आग को 'पूर्णयोग' के रूप में दार्शनिक रूप दिया, जो जीवन से भागने का नहीं, बल्कि सांसारिक जीवन को ही दिव्य चेतना में बदलने का संदेश देता है।
वैश्विक पटल पर सहज स्वीकृति
रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी, स्वामी युक्तेश्वर गिरि और स्वामी योगानंद जैसे महान आध्यात्मिक व्यक्तित्वों ने बंगभूमि पर योग के साथ अभिनव प्रयोग किए। आज पश्चिम के जिन देशों में योग एक बहु-अरब डालर का उद्योग बन चुका है, वहां योग का बीजारोपण करने वाले दोनों महापुरुष बंगाल की ही देन थे।
स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1893 में शिकागो के विश्व धर्म संसद में भारतीय दर्शन का डंका बजाया था। उनके द्वारा 1896 में लिखी गई पुस्तक 'राजयोग' ने पतंजलि के कठिन योग सूत्रों को आधुनिक दुनिया के सामने बेहद सरल रूप में पेश किया। स्वामी जी अक्सर कहते थे कि केवल सिर के बल खड़ा होना आध्यात्मिकता नहीं है बल्कि असली योग चरित्र निर्माण और आत्म-संयम में है।
उन्हीं के पथ पर चलते हुए परमहंस योगानंद ने अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'एक योगी की आत्मकथा/ योगी कथामृत' के माध्यम से पश्चिम के लाखों लोगों को 'क्रियायोग' से परिचित कराया और योग को वैश्विक पटल पर सहज स्वीकृति दिलाई।
प्राचीन गौरव का पुनर्जागरण
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच, आज वर्ष 2026 का अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बंगाल के लिए गौरवमयी पुनर्जागरण की तरह है। हुगली पर तैरती 500 से अधिक नौकाओं पर साधकों द्वारा योग करने के विहंगम दृश्य से लेकर कोलकाता के मुख्य आयोजन में करीब 35,000 लोग रेड रोड पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ योग आसन करेंगे।।
'योग फार हेल्दी एजिंग' की यह थीम हुगली के घाटों से लेकर शांतिनिकेतन के उपवनों तक गूंजेगी, कि बढ़ती उम्र के साथ कैसे योग के जरिए जीवन को ऊर्जावान, सक्रिय और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाए रखा जा सकता है। इसी के साथ यह आयोजन बंगाल की उस सनातन चेतना और गौरव का पुनर्जागरण भी होगा, जिसने योग के आध्यात्मिक स्वरूप को प्रथमतः राष्ट्रवाद और अंततः वैश्विक आंदोलन में रूपांतरित किया था!