गढ़वाल का वो नृत्य जब पूरा गांव बन जाता है देसी डांस फ्लोर, बिना DJ और म्यूजिक सिस्टम के यूं जमती है महफिल
उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र का पारंपरिक चौफुला नृत्य बिना किसी मंच या वाद्य यंत्र के किया जाता है।

उत्सव की जान है उत्तराखंड का चौफुला (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नृत्य एक ऐसी कला है जिसका आनंद सिर्फ वही जानता है, जिसने इसे पूरे मन से किया। पर आज नृत्य का मॉडर्न रूप डांस ने ले लिया है और जब भी शादी-ब्याह के मौके पर परफॉरमेंस होती है, तो उससे पहले हम कोरियोग्राफी, म्यूजिक और स्टेज जैसी बहुत सी तैयारी शुरू कर देते हैं।
जबकि हमारी संस्कृति में नृत्य कभी इन चीजों तक सीमित नहीं रहा। आज हम उत्तराखंड के ऐसे ही नृत्य की बात करेंगे जिसमें न तो कोई मंच की जरूरत है और न ही साज-सज्जा; पर यह पहाड़ों के उत्सव की जान कहलाता है।
उत्सव की जान है उत्तराखंड का चौफुला
चौफुला उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका शृंगार प्रधान होना। इसे आसान भाषा में समझें तो यह नृत्य प्रेम, आकर्षण और प्राकृतिक सौन्दर्य के इर्द-गिर्द घूमता है। चौफुला नाम में ‘चौ’ का मतलब चारों ओर और ‘फुला’ का मतलब खुशी है। इस नृत्य को आप उस खुशी से जोड़ सकते हैं, जब कोई व्यक्ति इतना खुश हो कि फूले ही न समाए। इसे बैसाखी, बसंत पंचमी और खास मौकों पर विशेष रूप से किया जाता है।
माता पार्वती ने सहेलियों के साथ किया था यह नृत्य
गढ़वाल क्षेत्र में चौफुला से जुड़ी पौराणिक मान्यता है कि यह नृत्य माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपनी सहेलियों के साथ पर्वत पर एक चौरी या चौपाल बनाकर किया था। कहते हैं कि जब यह नृत्य किया गया तो उस चौरी के चारों तरफ फूल ही फूल खिल गए थे। इसके बाद भोलेनाथ और माता पार्वती का विवाह हुआ था। तब से ही महिलाएं और पुरुष संग टोली बनाकर चौफुला डांस करते आ रहे हैं।
पाजेब और झांझ की झंकार ही काफी
इस नृत्य की सबसे खास बात यह है कि इसे करने के लिए किसी स्टेज, साज-सज्जा और यहां तक कि वाद्य यंत्र की भी जरूरत नहीं। इसके लिए तालियों की थाप, चूड़ियों की खनक, पाजेब और झांझ की झंकार और पैरों की थिरकन से निकलने वाला संगीत ही माहौल बना देता है।
कैसे किया जाता है चौफुला नृत्य?
चौफुला करने के लिए महिलाओं और पुरुषों का समूह खुले मैदान में आमने-सामने कतार में खड़ा हो जाता है। कुछ लोग लोकगीत गाना शुरू करते हैं और इसके बाद तालियां बजाते हुए नृत्य भी शुरू होता है। इसमें एक-दूसरे के सामने खड़े लोग ताली मिलाते हुए संतुलित लयबद्ध अंदाज में ठुमके लगाते हैं। यहां हाथों की थाप से ही नृत्य की गति तय होती है। वहीं, इसकी एक और नृत्य शैली है जिसका नाम लालुड़ी चौफुला है, जिसमें नर्तक कतार में न खड़े होकर गोल घेरे में नाचते हैं।
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