न ढोल-नगाड़े, न कोई गाना, सींग जैसे इस बाजे पर रातभर थिरकते हैं महाराष्ट्र के आदिवासी; दीवाली से है खास नाता
महाराष्ट्र का तारपा लोकनृत्य वारली जनजाति की सदियों पुरानी परंपरा है, जो दीवाली पर विशेष रूप से किया जाता है।

महाराष्ट्र का तारपा लोकनृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली दीयों से घरों को रौशन करके, रंगोली बनाकर और पटाखे जलाते हुए मनाते हैं, अब तो ऐसा लगता है कि पटाखे भी इसी परंपरा का हिस्सा बन गए हैं। पर भारत के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां आज भी दीपावली के पर्व पर सदियों पुरानी संस्कृति को जीवंत रखा जा रहा है। इसमें महाराष्ट्र में किया जाने वाला तारपा नृत्य खासतौर से शामिल है।
क्या है महाराष्ट्र का तारपा लोकनृत्य?
तारपा महाराष्ट्र के पालघर, ठाणे, दहानू के साथ ही गोवा के कोंकण जैसे क्षेत्रों में किया जाने वाला एक पारंपरिक आदवासी लोकनृत्य है। इसका संबंध इन क्षेत्रों में बसने वाली वारली जनजाति से है। इस नृत्य की सबसे खास बात यह है कि इसमें मौखिक गीतों की कोई भूमिका नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि तारपा एक वाद्य यंत्र है, जिसकी मधुर धुन ही कदमों को थिरकाने के लिए काफी है।
दीवाली पर खुशी से झूमते हैं आदवासी
इस डांस का दीवाली से खास संबंध है, कहा जाता है कि तारपा की धुन पर नाचे बिना यहां का दीवाली उत्सव अधूरा है। इसे मनाने के पीछे की मान्यता की बात करें, तो दीपावली वो समय होता है जब मौसम बदलने के साथ ही नई फसल की कटाई होती है। इसी खुशी में प्रकृति का आभार जताने के लिए तारपा की धुन पर आदिवासी महिलाएं और पुरुष रातभर नृत्य करते हैं। इसके अलावा, दशहरा, गर्भावस्था, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों में भी तारपा नृत्य किए जाने का खास महत्व है।
कैसे किया जाता है नृत्य?
वारली जनजाति में यह डांस गांव के खुले आंगन या चौपाल में आयोजित किया जाता है। एक व्यक्ति तारपा वादक होता है, जिसके चारों तरफ महिलाएं और पुरुष गोल घेरा बनाकर खड़े हो जाते हैं। जब तारपा की धुन निकलनी शुरू होती है, तो धीरे-धीरे सभी उसकी गति के साथ मेल बिठाते हैं और थिरकना शुरू कर देते हैं। फिर ताल से ताल मिलाकर सभी एक दूसरे की कमर में हाथ डालकर या हाथों में हाथ लेकर नाचते हैं।
तारपा जनजातीय विरासत का प्रतिबिंब
तारपा को महज लोक वाद्ययंत्र समझना एक बड़ी भूल होगी, क्योंकि यह वारली जनजाति की विरासत और उनकी समृद्ध परंपरा की झलक दिखाता है। यह मुड़े हुए सींग के आकार का म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट है, जिससे निकालने वाली धुन ऐसी है कि किसी के भी दिल को छू ले।
ईको फ्रेंडली है यह वाद्ययंत्र
सभी को अपनी आवाज से मंत्रमुग्ध कर देने वाले इस वाद्ययंत्र को बनाने के लिए आदिवासी कारीगर सभी ईको फ्रेंडली चीजों का इस्तेमाल करते हैं। इसे बांस की लकड़ी, सूखी लौकी यानी दुधी और ताड़ के पत्तों का उपयोग कर हाथ से तैयार किया जाता है।
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