कभी 'तवायफखाने का बाजा' कहकर उड़ाया मजाक, 40 साल तक रहा बैन; फिर कैसे भारत में रच-बस गया हारमोनियम?
क्या आप जानते हैं कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा लोकप्रिय वाद्ययंत्र 'हारमोनियम' भारत में पूरे 40 सालों तक बैन रहा था? ...और पढ़ें

भारत में 40 साल तक 'बैन' रहा यह मशहूर म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। संगीत के दिग्गज उस्ताद हों या गली-मुहल्ले में गाने वाले कलाकार, दरगाह हो, चर्च या फिर गुरुद्वारा- हारमोनियम हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। हमारे हिंदुस्तानी संगीत में यह शरीर और आत्मा की तरह घुल-मिल गया है। इस पर ऐसी धुनें सजी हैं जिन्हें लोग आज भी गुनगुनाते हैं।
हालांकि, क्या आप जानते हैं कि इस बेहद लोकप्रिय इंस्ट्रूमेंट को अपना वजूद साबित करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी? जी हां, जिस हारमोनियम को हम इतना अपना मानते हैं, वह इसी देश में पूरे 40 सालों तक बैन रहा था। आइए, इस सदाबहार वाद्ययंत्र की उस दिलचस्प कहानी पर नजर डालते हैं जो पाबंदियों से शुरू होकर कामयाबी के शिखर तक पहुंची।
भारत नहीं, यूरोप में हुआ था आविष्कार

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हारमोनियम आज इतना 'देसी' महसूस होता है कि ज्यादातर लोग इसे भारत की ही देन मानते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और है। हिंदुस्तानी संगीत में इसने खुद को कड़े विरोध के बीच स्थापित किया है।
- शुरुआती दौर में इसकी कोई खास इज्जत नहीं थी। लोग इसे केवल 'बाजा', 'पेटी' और 'तवायफ खाने का बाजा' कहकर बुलाते थे।
- असल में इसका आविष्कार 17वीं सदी की शुरुआत में यूरोप में हुआ था।
- एक वक्त था जब यह वाद्ययंत्र दुनिया से खत्म होने की कगार पर था, लेकिन फ्रांस में इसे एक नया जीवन मिला।
- साल 1840 में 'अलेक्जेंड्रे डेबेन' ने इसका पेटेंट कराया और इस बाजे को 'हारमोनियम' का नाम दिया।
चर्च के बड़े बाजे को मिला हाथों से बजने वाला रूप
- 19वीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी देशों के व्यापारी हारमोनियम को भारत लेकर आए थे।
- उस समय यह चर्च में बजने वाला एक काफी बड़ा इंस्ट्रूमेंट हुआ करता था, जिसे पैरों से पंप करके बजाया जाता था।
- 1875 का बदलाव: बंगाल की कंपनी 'द्वारकिन ऐंड सन' के द्वारकानाथ घोष ने इसमें बड़ा बदलाव किया और इसे हाथों से पंप करने वाले बाजे के रूप में विकसित किया।
यहीं से हारमोनियम ने भारत में कामयाबी की उड़ान भरी। जब यूरोप में इसका इस्तेमाल कम हो रहा था, तब 1915 तक भारत इसका दुनिया में सबसे बड़ा निर्माता बन चुका था। 19वीं सदी के आखिर में इसे पारसी और मराठी मंच नाटकों में हाथों-हाथ लिया गया, क्योंकि इसे उठाना-रखना, बजाना और सिखाना बहुत ही आसान था।
जब रवींद्रनाथ टैगोर और गांधी जी ने किया विरोध
हारमोनियम अपनी लोकप्रियता के शिखर पर था, लेकिन साल 1939 के आसपास इसके खिलाफ तेज आवाजें उठने लगीं।
- शास्त्रीय घरानों की नाराजगी: शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोग इसे अपने संगीत के लिए नुकसानदेह मानते थे और इसे अपनाने को तैयार नहीं थे।
- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन के दौरान हारमोनियम को एक 'विदेशी' बाजा माना गया, जिससे इसके खिलाफ माहौल और गरमा गया।
- दिग्गजों की अपील: पंडित जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर भी इसके सख्त खिलाफ थे। 19 जनवरी 1940 को टैगोर ने ऑल इंडिया रेडियो के कोलकाता केंद्र के निदेशक को पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि वे अपने आश्रम से इसे पूरी तरह हटा चुके हैं और अगर रेडियो से भी इसे बैन कर दिया जाए, तो यह भारतीय संगीत की बहुत बड़ी सेवा होगी। कई साहित्यकारों ने भी बैन के पक्ष में पत्र लिखे।

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रेडियो स्टेशनों पर रियाज तक की थी मनाही
विरोध के इस माहौल में, ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली केंद्र पर वेस्टर्न म्यूजिक के निदेशक जॉन फॉल्ड्स और मुंबई केंद्र के वॉल्टर कॉफमन ने भी हारमोनियम को भारतीय संगीत के लिए गैर-जरूरी बता दिया। लखनऊ संगीत अकैडमी के अध्यक्ष एस. एन. रतनजंकर ने भी बैन का समर्थन किया।
1 मार्च 1940 को एक सर्कुलर जारी हुआ और ऑल इंडिया रेडियो के सभी केंद्रों पर हारमोनियम पूरी तरह बैन कर दिया गया। रेडियो स्टेशनों को हुक्म दिया गया कि कोई भी रियाज के लिए हारमोनियम नहीं लाएगा और जो बाजे केंद्रों में मौजूद हैं, उन्हें नीलाम कर दिया जाए। इस फैसले का भारी विरोध हुआ। हारमोनियम बनाने वाली कंपनियों और कलाकारों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई।
40 साल की लंबी लड़ाई के बाद मिली आजादी
आजादी के बाद भी हारमोनियम की वापसी आसान नहीं थी।
- 1962-63 में जब बी. जी. रेड्डी सूचना प्रसारण मंत्री बने, तो बैन हटाने की मांग ने जोर पकड़ा। पुणे में लोगों ने उनका घेराव तक किया, लेकिन उन्होंने पाबंदी नहीं हटाई।
- 1970 का सेमिनार: सालों बाद इस मुद्दे पर एक सेमिनार हुआ जिसमें बड़े संगीतकार और एक्सपर्ट शामिल हुए। बीच का रास्ता निकालते हुए तय हुआ कि प्रयोग के तौर पर इसे 'टॉप ग्रेड' कलाकारों के साथ सिर्फ संगत वाद्य के रूप में बजाया जाए। वहीं, अकेले हारमोनियम बजाने की इजाजत सिर्फ उच्च कोटि के वादकों को दी गई।
- पूर्ण रूप से हटा बैन: आखिरकार, 40 साल लंबे इंतजार के बाद, 18 अप्रैल 1980 की शाम के समाचार बुलेटिन में हारमोनियम पर लगे सभी प्रतिबंधों को पूरी तरह से समाप्त करने का ऐतिहासिक ऐलान कर दिया गया।

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बैन के बावजूद कम नहीं हुई दीवानगी
भले ही रेडियो पर हारमोनियम ने लंबा वनवास झेला हो और कुछ शास्त्रीय घरानों ने इससे किनारा कर लिया हो, लेकिन इसकी बिक्री पर कभी कोई असर नहीं पड़ा। आम लोगों के रियाज और इसकी खरीद-फरोख्त पर कभी कोई रोक नहीं थी।
इसकी कामयाबी का सबसे बड़ा राज इसकी सहजता है। इसे कहीं भी ले जाना और सीखना बेहद सरल है। पिछले करीब 50 सालों से गुरुद्वारों में हारमोनियम को हटाकर वापस तानपुरा और सारंगी लाने की चर्चा होती रही है, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया क्योंकि तानपुरा या तंबूरा सीखने और बजाने में लोगों की खास रुचि नहीं है।
तमाम पाबंदियों के बावजूद, आजादी के बाद हारमोनियम की बिक्री में जबरदस्त उछाल आया। आज के समय में म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स में सबसे ज्यादा बिक्री इसी की होती है और विदेशों में भी इसकी जबरदस्त मांग है।
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