सिर्फ 10 मिनट की स्क्रॉलिंग और खुद से नफरत, सोशल मीडिया कैसे बर्बाद कर रहा है लड़कियों की मेंटल हेल्थ?
सोशल मीडिया के नेगेटिव कंटेंट टीनएज लड़कियों की मेंटल हेल्थ पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। ...और पढ़ें
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सोशल मीडिया का टीनएज लड़कियों की मेंटल हेल्थ पर असर (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जिस सोशल मीडिया को हम अपने मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करते हैं, वह टीनेएज लड़कियों के लिए मेंटल टॉर्चर की वजह बनता जा रहा है?
जिन बातों को अक्सर मजाक समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वो बातें किशोरावस्था से गुजर रही लड़कियों के मन पर काफी गहरा प्रभाव डालता है। आइए टीनेज लड़कियों पर सोशल मीडिया के इस प्रभाव को समझते हैं।
सिर्फ 10 मिनट और खुद से नफरत
सोशल मीडिया का प्रभाव कितना गहरा और तुरंत हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 10 मिनट तक स्क्रीन स्क्रॉल करने पर एक टीनेज लड़की को अपने ही शरीर और चेहरे से नफरत महसूस होने लगती है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लड़कियों को इंसान के बजाय एक वस्तु की तरह पेश किया जा रहा है। यहां न केवल उनके लुक्स की रेटिंग की जाती है, बल्कि उनके खिलाफ सांकेतिक भाषा में अभद्र टिप्पणियां भी की जाती हैं।
नफरत को मिल रही है लाइक की शक्ति
सबसे डरावना पहलू यह है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दुष्कर्म जैसी गंभीर घटनाओं पर भी भद्दे मजाक किए जाते हैं। इन आपत्तिजनक पोस्ट्स को हजारों लाइक्स मिलते हैं, जो समाज की गिरती मानसिकता को दर्शाते हैं। कम उम्र के लड़के अनजाने में ही ऐसी अश्लीलता और नफरती भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे सालों की मेहनत के बाद हासिल की गई लैंगिक समानता खत्म होती नजर आ रही है।
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एल्गोरिदम और नकली मर्दानगी का खेल
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम टीनएजर्स को ऐसा कंटेंट परोसते हैं जो पुरुष श्रेष्ठता का दावा करती है। इससे लड़कों के मन में यह गलत धारणा घर कर रही है कि लड़कियों को नीचा दिखाना ही असली मर्दानगी है।
दूसरी ओर, लड़कियां जब अपनी तुलना इंटरनेट पर मौजूद परफेक्ट तस्वीरों से करती हैं, तो वे बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर का शिकार हो जाती हैं। वे खुद को असुरक्षित और दूसरों से कमजोर समझने लगती हैं, जिससे उनमें डिप्रेशन की दर लड़कों के मुकाबले दोगुनी हो गई है। हालात इतने गंभीर हैं कि कुछ लड़कियां आत्मघाती कदम उठाने तक का सोचने लगती हैं।

(AI Generated Image)
आंकड़े जो डराते हैं
एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 38% महिलाएं ऑनलाइन हिंसा का सामना करती हैं। इसी खतरे को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, ताकि बच्चों को इस जहरीली मानसिकता से बचा सकें।
बचाव का रास्ता क्या है?
सिर्फ तकनीक पर रोक लगाना ही समाधान नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे जरूरी कदम है स्कूलों और घरों में लड़कों को ऑनलाइन एथिक्स सिखाना। उन्हें यह समझाना बेहद जरूरी है कि वर्चुअल दुनिया में भी किसी का सम्मान करना उतना ही जरूरी है जितना असल जिंदगी में।