जब न WhatsApp था, न कार्ड, न फोन... फिर कैसे दूर-दूर तक पहुंचता था शादी का बुलावा? दिलचस्प है इतिहास
क्या आपने कभी सोचा है कि जब प्रिंटिंग प्रेस का नामोनिशान नहीं था, तब लोगों को शादी का बुलावा कैसे भेजा जाता था?

जब नहीं थीं प्रिंटिंग मशीनें, तो कैसे भेजे जाते थे शादी के कार्ड? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में शादियों के कार्ड लग्जरी का नया पैमाना बन चुके हैं। शानदार डिब्बों में सजे निमंत्रण और पलक झपकते ही मोबाइल पर आ जाने वाले डिजिटल कार्ड अब आम बात हैं।
मगर सोचिए, जब दुनिया में छपाई की कोई मशीन नहीं थी, तब लोग एक-दूसरे को अपनी खुशियों में कैसे शामिल करते थे? आइए, इस आर्टिकल में विवाह निमंत्रण के रोमांचक इतिहास के बारे में जानते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
जब बोलकर और ढोल-नगाड़ों से मिलता था बुलावा
1447 से पहले जब दुनिया में जब छपाई का कोई साधन नहीं था, तब इंग्लैंड में 'टाउन क्रायर' नाम का एक खास पेशा हुआ करता था। ये लोग पूरे शहर की गलियों में घूम-घूमकर ऊंची आवाज में शादियों का ऐलान करते थे।
वहीं, पुराने समय के भारत में भी जब डाक सेवा जैसी कोई सुविधा नहीं थी, तब लोग खुद घर-घर जाकर मुह-जुबानी संबंधियों को न्यौता देते थे। दूसरी तरफ, राजा-महाराजा अपनी रियासत की जनता को ढोल-नगाड़े बजवाकर या मुनादी के जरिए समारोह में बुलाते थे। अगर किसी दूसरे राज्य के राजा या मित्र को बुलाना हो, तो घुड़सवार दूतों के हाथों शाही मुहर लगे हुए खत भेजे जाते थे।
प्राचीन सभ्यताओं में कैसे भेजे जाते थे शादी के न्यौते?
अलग-अलग प्राचीन सभ्यताओं में निमंत्रण भेजने के तरीके भी बेहद हैरान करने वाले थे:
- यूनान और रोम: यहां शादी के निमंत्रण किसी कागज पर नहीं, बल्कि सीधे पत्थरों और धातुओं पर उकेरे जाते थे। इसके अलावा यूनान में बोलकर भी जश्न की घोषणा करने का रिवाज था।
- चीन: पुरानी चीनी सभ्यता में कार्ड की सजावट और सुंदर लिखावट पर बहुत ध्यान दिया जाता था। यह निमंत्रण भेजने वाले परिवार के रुतबे और उनकी पसंद को दर्शाता था।
- मिस्र: मिस्र के अमीर तबके के लोग पपीरस के स्क्रॉल का इस्तेमाल करते थे। इन पर खास चित्रलिपि बनी होती थी, जिसमें शादी की जानकारी के साथ-साथ नए जोड़े के लिए दुआएं भी लिखी होती थीं।
यूरोप के रईसों का शौक जो बन गया आम जरूरत
यूरोप में मध्यकाल के दौरान अमीर और सामंती परिवारों ने कुछ नया करने की सोची। उन्होंने हाथ से लिखे बेहद खूबसूरत कार्ड बनवाना शुरू किया, जिनमें कई बार कीमती चीजें भी जड़ी होती थीं।
हालांकि, जैसे ही प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार हुआ, निमंत्रण का पूरा तरीका ही बदल गया। छपाई आसान और सस्ती हो गई, जिससे मिडिल क्लास के लोग भी कार्ड छपवाने लगे। पुराने समय में मशीन से छपे ये कार्ड बहुत विस्तृत होते थे, जिनमें हर एक मेहमान का नाम अलग से लिखा जाता था।
1980 को माना जाता है वेडिंग कार्ड्स का गोल्डन टाइम
भारत में वेडिंग कार्ड्स का चलन बहुत पुराना नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत 19वीं सदी में ही हुई थी। अंग्रेजों की देखादेखी यहां के कुलीन वर्ग ने इसे अपनाया, लेकिन जल्द ही हमने इसे पूरी तरह से अपनी संस्कृति के रंग में रंग लिया।
1950 तक शुरुआती कार्ड बहुत ही सादे, बेरंग और छोटे होते थे। इनमें सिर्फ जरूरी जानकारी जैसे- दूल्हा-दुल्हन का नाम, समय और जगह का जिक्र होता था। वहीं, 1960 के दौर में कार्ड्स में चटक रंगों का इस्तेमाल शुरू हुआ। वहीं 1980 का समय भारतीय कार्ड्स का 'गोल्डन टाइम' माना जाता है। इसी समय भगवान गणेश और श्री राधा-कृष्ण की तस्वीरों के साथ-साथ पारंपरिक प्रतीकों ने कार्ड्स में जगह बनाई।
ई-वेडिंग इनविटेशन बने आज की स्मार्ट चॉइस
बदलते वक्त के साथ शादी के कार्ड्स की डिजाइनिंग और उनकी पैकेजिंग बहुत शानदार हो गई है। वहीं, 21वीं सदी की डिजिटल क्रांति ने निमंत्रण के तरीके को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। आज के समय में ई-इनविटेशन लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं, क्योंकि ये सस्ते भी होते हैं और इन्हें बिना किसी झंझट के तुरंत भेजा जा सकता है।
