ठेठ अवधी-भोजपुरी बोली में गाया गया ये लोकगीत, चुलबुले अंदाज में बयां करता है रेल को सौतन बताती पत्नी का दर्द
उत्तर प्रदेश और बिहार का पारंपरिक लोकगीत 'बैरन रेलिया' उस पत्नी की व्यथा बताता है जिसका पति रोजी-रोटी के लिए शहर जाता है।

आधुनिक गानों से बिल्कुल अलग है 'बैरन रेलिया' लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के पूर्वांचल की संस्कृति आज भी लोगों को यहां की मिट्टी से जोड़े रखी है। यहां के गांवों की असली महक सदियों पुराने लोकगीतों में बसती है। यहां सदियों से कई लोकगीत गाए जा रहे हैं और इन्हीं में से एक पारंपरिक गीत है- 'बैरन रेलिया पिया को लिए जाए रे... खुले ना केवड़िया, बलम लिए जाए रे'।
यह मात्र एक गीत नहीं, बल्कि उस पत्नी की बेबसी की दास्तान है, जिसका पति रोजी-रोटी कमाने के लिए उसे गांव में अकेला छोड़कर शहर जा रहा है। जी हां, पति के परदेस जाने पर पीछे छूट गई पत्नी के दर्द को यह गीत इतने चुलबुले अंदाज में पेश करता है कि सुनने वाले को इसके बोलों से प्यार हो जाए।
"रेलिया बैरन भई रे..."
इस लोकगीत का ताना-बाना 19वीं और 20वीं सदी के उस दौर में बुना गया, जब देश में रेलगाड़ियों का जाल बिछना शुरू हुआ था। रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में यूपी और बिहार के पुरुषों ने कलकत्ता, बंबई और कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों की तरफ पलायन करना शुरू कर दिया।
इस पलायन में पुरुष तो शहर चले जाते थे, लेकिन उनकी नई-नवेली पत्नियां गांव की चौखट पर ही इंतजार करने के लिए छूट जाती थीं। उस दौर में चिट्ठियां भी महीनों में पहुंचती थीं और पति-पत्नी का मिलन सालों तक नहीं हो पाता था। इसी अकेलेपन और जुदाई ने 'बैरन रेलिया' जैसे मार्मिक लोकगीतों को जन्म दिया।
पत्नी के लिए क्यों 'सौतन' बन गई रेल?
इस गीत की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें पत्नी अपना गुस्सा अपने पति की मजबूरी पर नहीं, बल्कि उस निर्जीव रेलगाड़ी पर निकालती है जो उसके जीवनसाथी को उससे दूर ले जा रही है। वह ट्रेन को अपनी 'बैरन' यानी सौतन मान बैठती है।
पत्नी के सीधेपन और प्यार की गहराई को गीत की इन पंक्तियों में महसूस किया जा सकता है, जहां वह दुआ करती है कि जिस टिकट से उसका पति जा रहा है, वह बारिश में भीगकर खराब हो जाए:
"जौंन टिकसवा से बलमा मोरे जंइहे, पानी बरसे टिकस गल जाये रे..."
वह बात यहीं तक नहीं रुकती। विरह की मारी पत्नी उस शहर और वहां के अफसरों को भी कोसती है, जहां उसका पति नौकरी करने जा रहा है। वह गाती है कि उस शहर में आग लग जाए, ताकि उसका पति वापस लौट आए। यह किसी का बुरा चाहने की नीयत नहीं है, बल्कि अपने जीवनसाथी को अपनी आंखों के सामने रोकने की एक मासूम कोशिश है।
क्या है इस लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत?
यह गीत मुख्य रूप से अवधी और भोजपुरी के मिले-जुले ग्रामीण लहजे में गाया जाता है। इसकी शब्दावली सीधे गांव की पगडंडियों से निकली है। बता दें, यह सिर्फ पति-पत्नी के बिछड़ने का गीत नहीं है, बल्कि यह उस दौर के सामाजिक और आर्थिक हालातों का आईना है। यह बताता है कि कैसे गरीबी और पेट की भूख ने हंसते-खेलते परिवारों के बीच मीलों की दूरियां खींच दी थीं।
इस गीत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी कई लोक गायिकाओं ने गाया है। हाल के दशकों में पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी मशहूर गायिकाओं ने इसे अपनी बुलंद और दर्द भरी आवाज से देश-दुनिया के मंचों तक पहुंचाया है। 'बैरन रेलिया' में छिपा पत्नी का गुस्सा असल में उसका वह गहरा प्यार है, जो मीलों की दूरी बर्दाश्त नहीं कर सकता। यही वजह है कि इतने दशकों बाद भी यह गीत हमारी देहाती संस्कृति की एक अनमोल धरोहर बना हुआ है।
