तारीफ नहीं है ‘सुपरवुमन’ कहलाना, कैसे महिलाओं को भीतर से खोखला कर देता है यह सिंड्रोम
महिलाओं पर सामाजिक रूप से हर काम और भूमिका में परफेक्ट बनने का दबाव होता है, जिसे सुपरवुमन सिंड्रोम कहते हैं। ...और पढ़ें

आप भी तो नहीं हैं सुपरवुमन सिंड्रोम का शिकार? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में महिलाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे एक सक्सेसफुल करियर संभालें, घर को शीशे की तरह चमका कर रखें, बच्चों की परवरिश में कोई कमी न छोड़ें और इन सबके बीच हमेशा खुश और फिट भी दिखें। इसी सब कुछ अकेले और परफेक्ट तरीके से करने की चाहत को साइकोलॉजी की भाषा में सुपरवुमन सिंड्रोम कहते हैं।
भले ही यह सुनने में किसी तारीफ जैसा लगे, लेकिन असल में यह एक गंभीर साइकोलॉजिक कंडीशन है, जो धीरे-धीरे महिलाओं को भीतर से खोखला कर देती है। इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आइए समझते हैं कि यह क्या है और इससे बाहर कैसे निकलें।
सुपरवुमन सिंड्रोम क्या है?
यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक स्थिति है। इसमें एक महिला खुद पर यह दबाव डालती है कि उसे जीवन की हर भूमिका को बिना किसी की मदद लिए और बिना किसी गलती के निभाना है।
सुपरवुमन सिंड्रोम के लक्षण कैसे होते हैं?

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- हर काम के लिए हां कहना, भले ही आपके पास समय न हो।
- दूसरों से मदद मांगने में शर्म या कमजोरी महसूस करना।
- अपने लिए समय निकालने पर गिल्ट महसूस करना।
- लगातार थकान, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी।
- हमेशा यह डर सताना कि अगर आपने कोई काम नहीं किया, तो सब बिखर जाएगा।
यह सिंड्रोम कैसे नुकसान पहुंचा सकता है?
जब आप अपनी क्षमता से ज्यादा बोझ उठाती हैं, तो शरीर और मन जवाब देने लगता है। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने से बर्नआउट, तनाव, डिप्रेशन, और हार्मोनल इंबैलेंस जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आप शारीरिक रूप से मौजूद तो होती हैं, लेकिन मानसिक रूप से इतनी थकी होती हैं कि जीवन का आनंद लेना भूल जाती हैं।
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इस चक्र से बाहर निकलने के लिए क्या करें?
अगर आप भी खुद को इस स्थिति में पा रही हैं, तो ये बदलाव इससे बाहर निकलने में आपकी मदद कर सकते हैं-
- परफेक्शन की परिभाषा बदलें- यह समझें कि कोई भी इंसान हर समय हर काम में परफेक्ट नहीं हो सकता। कभी-कभी घर का बिखरा होना या ऑफिस के किसी काम में देरी होना सामान्य है। खुद को इंसान समझें, मशीन नहीं।
- मदद मांगना सीखें- घर और बाहर की जिम्मेदारियों को बांटें। बच्चों को छोटे-छोटे काम सिखाएं और पार्टनर या सहकर्मियों से खुलकर मदद मांगें। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।
- ना कहना शुरू करें- अपनी सीमाओं को पहचानें। अगर आप पहले से ही थकी हुई हैं, तो नए काम या सामाजिक कार्यक्रमों के लिए ना कहें। आपकी एनर्जी सीमित है, इसे सही जगह इस्तेमाल करें।
- मी-टाइम को प्राथमिकता दें- दिन भर में कम से कम 30 मिनट सिर्फ अपने लिए निकालें। इसमें आप योग कर सकती हैं, कोई किताब पढ़ सकती हैं या बस शांति से बैठ सकती हैं। खुद की देखभाल करना स्वार्थ नहीं, बल्कि जरूरत है।
- अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाएं- हम अक्सर उन कामों की लिस्ट देखते हैं जो पूरे नहीं हुए। इसके बजाय, उन कामों को देखें जो आपने सफलतापूर्वक किए हैं। खुद की सराहना करना सीखें।