सपेरों के समुदाय से शुरू हुआ था राजस्थान का ये डांस, आज दुनियाभर में है मशहूर; दिलचस्प है पूरी कहानी
कालबेलिया डांस राजस्थान की संस्कृति का अहम हिस्सा है, जो कालबेलिया समुदाय से जुड़ा है।

क्या है कालबेलिया की कहानी? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान की लोक संस्कृति की बात करें, तो कालबेलिया डांस का नाम लेना जरूरी है। ये डांस आज भले ही दुनियाभर में मशहूर है, लेकिन इसका इतिहास एक खास समुदाय से जुड़ा है।
कालबेलिया डांस सांपों का नृत्य दिखाने वाले एक राजस्थानी समुदाय से जुड़ा है। ये समुदाय गांव-गांव में घूमकर सांपों को पकड़ते और उनका नृत्य दिखाते। कालबेलियां डांस की शुरुआत भी कुछ ऐसे ही हुई थी। आइए जानें राजस्थान के इस लोकनृत्य की कहानी।
कालबेलिया नृत्य की शुरुआत
कालबेलिया नृत्य राजस्थान की कालबेलिया जनजाति से जुड़ा है। ये जानजाति खानाबदोश रही है और एक जगह से दूसरी जगह अपना ठिकाना बदलती रहती है। पारंपरिक रूप से इनका सांप पकड़ने और सांप का जहर उतारने का काम था और इसी पेशे की वजह से इनका नाम कालबेलिया पड़ा। काल यानी मृत्यु, जिसे सांप से जोड़कर देखा जाता है और बेलिया यानी दोस्त, जो सांपो के दोस्त हैं, वो कालबेलिया है।
कालबेलिया समुदाय के लोग गांव-गांव में घूम-घूमकर सांपों का नृत्य दिखाया करते। एक जगह से दूसरी जगह के सफर के दौरान मनोरंजन के लिए महिलाएं डांस किया करतीं और पुरुष पुंगी या खंजरी बजाते। इनका नृत्य सांप की चाल से मिलता-जुलता दिखता था, इसलिए इस लोकनृत्य का नाम भी कालबेलिया रखा गया और इसी तरह इस डांस की शुरुआत हुई।
1972 में आया कालबेलिया समुदाय में बदलाव
1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू हुआ, जिसके तरत सांपों को पकड़ने और उनके करतब दिखाने पर रोक लगा दी गई। इस अधिनियम का सीधा असर कालबेलिया समुदाय की रोजी-रोटी पर पड़ा। तब अपना घर चलाने के लिए महिलाएं अपने इस पारंपरिक हुनर को स्टेज पर लेकर आईं और गुलाबो सपेरा जैसी नर्तकियों ने इस डांस को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई।
क्या है कालबेलिया नृत्य की खासियत?
इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत है कि इसकी मुद्राएं सांप की मुद्रा से मिलती-जुलती हैं। महिलाएं संगीत पर अपने शरीर को बिल्कुल सांप की तरह लचकाती हैं, जो दर्शकों को हैरान कर देता है। यह डांस काफी तेज रफ्तार से पुंगी और खंजरी जैसे वाद्य यंत्रों की धुन पर किया जाता है।
कालबेलिया डांस का पारंपरिक पोशाक में महिलाएं काले रंग का चोला और एक बड़ा घेरदार लहंगा पहनती हैं। कपड़ों का काला रंग भी सांप के रंग से जोड़कर देखा जाता है। इनकी पोशाक पर रंग-बिरंगे धागों की कढ़ाई होती है और छोटे-छोटे शीशे और गोटे का बारीक काम होता है। घाघरे को काफी घेरदार रखा जाता है, जो डांस करते समय कमाल का विजुअल इफेक्ट देता है।
कालबेलिया नृत्य सिर्फ महिलाएं करती हैं और पुरुष संगीत का काम देखते हैं। पुंगी, खंजरी और ढोलक जैसे वाद्ययंत्रों से वे कालबेलिया का रिदम सेट करते हैं, जिस पर महिलाएं बहुत खूबसूरती से थिरकती हैं। गाने की शुरुआत धीमी होती है, जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है, जिससे निगाहें हटाना मुश्किल हो जाता है।
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