बच्चों की मस्ती और बड़ों के आइडिया! क्रिएटिविटी की इस टक्कर में किसने मारी बाजी, स्टडी ने बताया
शोध में पाया गया कि युवा बच्चों की तुलना में अधिक रचनात्मक होते हैं, हालांकि बच्चे काम करते समय ज्यादा खुश नजर आए।

स्टडी ने पलटी क्रिएटिविटी वाली आम धारणा (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि छोटे बच्चे बड़ों से ज्यादा क्रिएटिव होते हैं और उनमें कुछ नया सीखने का उत्साह भी उनसे ज्यादा होता है। बच्चों के हाथ में जब आप कलर पेंसिल पकड़ाएंगे, तो आप देखेंगे कि वह खुश होकर कागज पर कुछ भी चित्रकारी करना शुरू कर देगा।
वहीं, किसी युवा को ऐसा करने के लिए दिया जाए, तो कुछ भी करने से पहले सौ बार सोचेगा। बस इसी फर्क को समझाने के लिए हाल ही में एक स्टडी सामने आई है, आइए इसपर थोड़ा विस्तार से बात करते हैं।
स्टडी ने पलटी क्रिएटिविटी वाली आम धारणा
अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रिया की ग्रॉज यूनिवर्सिटी और बेल्जियम की यूसीएलूवेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में बच्चों और बड़ों की क्रिएटिविटी के स्तर को लेकर रिसर्च की। जिसमें उन्होंने 4-7 साल के कुल 92 बच्चों के साथ 20-29 साल के युवाओं को शामिल किया।
इन सभी को अलग-अलग टास्क देकर क्रिएटिविटी का पता लगाया गया। जिसमें पहला काम था खाली टिन के डिब्बों से कुछ अलग बनाना, दूसरा बिना डेडलाइन के अपनी फेवरेट ड्रॉइंग बनाना और तीसरा आठ मिनट की समय सीमा में मन में आए जानवर की तस्वीर ड्रॉ करना।
युवा दिखे ज्यादा क्रिएटिव
इसके नतीजों में पाया गया कि युवा बच्चों से ज्यादा रचनात्मक थे, उनका प्रदर्शन कहीं ज्यादा बेहतर रहा। इन तीनों ही कामों में युवाओं के विचार ज्यादा मौलिक और उपयोगी पाए गए। इसमें भी खासकर उन चीजों में युवाओं का प्रदर्शन तारीफ के काबिल था, जिसमें समय सीमा दी गई थी।
बच्चे काम करते समय ज्यादा खुश नजर आए
वहीं, इस रिसर्च में एक नया मोड़ यह है कि भले ही युवाओं ने अपने काम को क्रिएटिविटी के साथ किया हो, लेकिन बच्चों ने अपने टास्क को दोगुनी खुशी और उत्साह के साथ किया। वहीं, बड़ों में उस दौरान तनाव, दबाव विफलता का डर और घबराहट देखी गई।
क्रिएटिविटी के भ्रम को तोड़ें
यह स्टडी इसी बात पर जोर देती है कि बच्चे काम को करते हुए उसमें डूब जाते हैं तो इसका मतलब उनका ज्यादा क्रिएटिव होना नहीं है। शोधकर्ताओं का मानना है कि समय के साथ हमारी सोच, विचार और क्रिएटिविटी का भी उतनी ही गति से विस्तार होता है। ऐसे में इस भ्रम को तोड़ दिया जाना चाहिए कि बच्चे ज्यादा कल्पनाशील हैं। बस दोनों के बीच फर्क यह है कि बड़े अपनी क्रिएटिविटी को डर की वजह से दबा देते हैं।
