पढ़ाई में मन नहीं, रातों की नींद गायब, जानिए बच्चों में बढ़ते मोबाइल एडिक्शन के गंभीर खतरे और शुरुआती लक्षण
वर्तमान डिजिटल युग में बच्चों में मोबाइल की लत एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है, जो उनकी पढ़ाई, नींद और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही है।

बच्चों को मोबाइल की लत तो नहीं लग गई है? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। वर्तमान डिजिटल युग में मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन, दोस्तों से बातचीत और नई जानकारियां हासिल करने के लिए बच्चे इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मोबाइल का यही उपयोग जब उनकी पढ़ाई, नींद, खेलकूद और सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगे तो चिंता का विषय बन जाता है।
अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि कहीं उनका बच्चा मोबाइल पर जरूरत से ज्यादा निर्भर तो नहीं हो रहा है। केवल स्क्रीन पर बिताया गया समय ही मोबाइल एडिक्शन का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि बच्चा अपने उपयोग पर कितना नियंत्रण रख पाता है और इससे उसके दैनिक जीवन पर क्या असर पड़ रहा है। इस बारे में बता रहे हैं डॉ. युवराज पंत, हल्द्वानी।
क्यों बढ़ रही है मोबाइल की लत?
बच्चों में मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के पीछे कई मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, विकासात्मक और सामाजिक कारण होते हैं। कई बच्चे बोरियत, अकेलेपन, चिंता, उदासी या तनाव से बचने के लिए मोबाइल का सहारा लेते हैं। गेम, छोटे वीडियो और मनोरंजन की सामग्री उन्हें त्वरित आनंद देती है।
बचपन और किशोरावस्था में निर्णय लेने व भविष्य के परिणामों को समझने की क्षमता विकसित होती है। ऐसे में आकर्षक गेम और इंटरनेट मीडिया बच्चों के लिए मोबाइल से दूरी बनाना मुश्किल कर सकते हैं। दोस्तों के बीच लोकप्रिय होने की इच्छा या दूसरों से तुलना मोबाइल के उपयोग को बढ़ाती है।
परिवार का माहौल भी बड़ा कारण है। यदि माता-पिता लगातार मोबाइल में व्यस्त रहते हैं या छोटे बच्चों को शांत कराने के लिए बार-बार मोबाइल देते हैं, तो यह मनोरंजन का साधन बच्चे के लिए लत में बदल जाता है।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
बच्चे के व्यवहार में कुछ बदलाव मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता का संकेत हो सकते हैं। निर्धारित सीमा के बाद भी बार-बार मोबाइल इस्तेमाल करना, फोन लेने पर गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाना और पढ़ाई, खेलकूद या अन्य गतिविधियों में रुचि कम होना ऐसे ही संकेत हैं।
मोबाइल के कारण सोने-जागने की दिनचर्या बिगड़ना, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाना तथा दैनिक जिम्मेदारियों की अनदेखी करना भी चिंता बढ़ाता है। मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों की एकाग्रता और पढ़ाई को प्रभावित कर सकता है।
रात में देर तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित हो सकती है, जो अगले दिन की उनकी दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित करता है। शारीरिक गतिविधियां घटने से आंखों में थकान, सिरदर्द और अत्यधिक आलस जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
डांट नहीं, संवाद से निकलेगा समाधान
मोबाइल की समस्या से निपटने में अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। माता-पिता को बच्चों के साथ मिलकर मोबाइल इस्तेमाल करने के स्पष्ट और उचित नियम बनाने चाहिए। इन नियमों का पालन केवल बच्चों से कराने की जगह अभिभावकों को पहले स्वयं अपना व्यवहार बदलकर उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
क्योंकि बच्चे कहकर नहीं बल्कि देखकर ज्यादा सीखते हैं। बच्चों को डांटने या अपमानित करने के बजाय उनकी बात सुनना और मोबाइल के प्रति उनके आकर्षण को समझना अधिक प्रभावी हो सकता है। बच्चों की दिनचर्या में पढ़ाई, खेलकूद, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा उन्हें पेंटिंग, डांस, किताबें पढ़ने, बागवानी, खेलकूद या अन्य रचनात्मक गतिविधियों के अवसर देते हुए लगातार प्रोत्साहित करें।
स्कूल और विशेषज्ञ भी निभाएं जिम्मेदारी
विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता, सुरक्षित इंटरनेट उपयोग, समय प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए। अभिभावकों के अलावा शिक्षकों को भी बच्चों की एकाग्रता, सामाजिक सहभागिता और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।
यदि मोबाइल का उपयोग बच्चे की नींद, पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, तो चाइल्ड साइकोलाजिस्ट या क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट से परामर्श अवश्य लेना चाहिए। सकारात्मक प्रोत्साहन और छोटे तथा व्यावहारिक लक्ष्य इस लत से बाहर निकलने की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं।
बच्चों को तकनीक से पूरी तरह नहीं रख सकते दूर
मोबाइल एडिक्शन का हल केवल मोबाइल दूर रखने से नहीं निकल सकता। इसका असली उद्देश्य उन्हें मोबाइल का सुरक्षित, जिम्मेदार और संतुलित उपयोग सिखाना है। परिवार, स्कूल और समाज मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां बच्चों को स्क्रीन के बाहर भी खुशी, दोस्ती और रचनात्मकता के पर्याप्त अवसर मिलें।
तभी तकनीक उनके विकास का माध्यम बनेगी, बचपन पर हावी होने वाली आदत नहीं। अभिभावक बच्चों का मोबाइल इस्तेमाल करने का समय निर्धारित करें। मनोविज्ञान के अनुसार दो घंटे से ज्यादा अनावश्यक फोन का इस्तेमाल उन्हें एडिक्ट बना सकता है।
काउंसलिंग से निकली राह
हल्द्वानी के गौलापार का एक 14 वर्षीय किशोर आनलाइन गेमिंग की लत से ग्रस्त था। पढ़ाई से दूर भागता था। इस लत से चिंतित अभिभावकों ने काउंसलिंग शुरू कराई है। नैनीताल के एक उच्च आय वर्ग परिवार में माता-पिता दोनों काम पर व्यस्त रहते हैं।
उनका 12 वर्षीय बेटा बोरियत और अकेलापन दूर करने के लिए पूरा दिन मोबाइल पर गेम खेलता या वीडियो देखता है। जब अभिभावक को बच्चे में उदासी और तनाव जैसे लक्षण दिखे तो उसे काउंसलिंग के लिए लाए। धीरे-धीरे दोनों की आदतों में बदलाव दिख रहा है और मोबाइल से स्वयं ही सीमित हो रहे हैं।
(लेखक राजकीय मेडिकल कालेज हल्द्वानी के तहत संचालित डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल के वरिष्ठ मनोविज्ञानी हैं)
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