न ऑनलाइन गिफ्ट्स, न फैंसी लाइट्स! 90s के दौर में ऐसे रोशन होती थी दीवाली, आज भी याद आते हैं 5 रिवाज
90 के दशक और उससे पहले वाली वो दीवाली एक दिन का इवेंट नहीं, बल्कि पूरे एक महीने का ईवेंट ...और पढ़ें

एक दिन का त्योहार नहीं, पूरे महीने का जलसा थी पहले की दीवाली (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली का त्योहार जब भी करीब आता है, बाजार रोशनी और नई-नई चीजों से जगमगा उठते हैं। आज हमारे पास एक से बढ़कर एक फैंसी एलईडी लाइट्स, ऑनलाइन गिफ्ट्स और रेडीमेड मिठाइयां हैं, लेकिन अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो वो 'बचपन वाली दीवाली' की बात ही कुछ और थी।
दरअसल, उस समय दीवाली सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं था, बल्कि पूरे एक महीने का सेलिब्रेशन हुआ करता था। आइए, इस आर्टिकल में आपको उन चीजों की याद दिलाते हैं जो पहले की दीवाली का सबसे अहम हिस्सा हुआ करती थीं।

(Image Source: AI-Generated)
पूरे घर की सफाई और चूने वाली पुताई
आजकल हम पेंटर्स को बुलाकर या वैक्यूम क्लीनर से घर चमका लेते हैं, लेकिन पहले दीवाली की सफाई किसी बड़े फैमिली मिशन से कम नहीं होती थी। घर के भारी संदूकों से लेकर छत के जालों तक, सब कुछ साफ किया जाता था। इनमें, सबसे खास होती थी घर की पुताई। बाजार से कट्टे में भरकर सफेद चूना आता था, उसमें हल्का-सा नील मिलाया जाता था और घर के सदस्य खुद ही दीवारों को रंगने में जुट जाते थे। उस चूने की जो महक पूरे घर में फैलती थी, वो असल में दीवाली के करीब आने का पहला अहसास होती थी।
मिट्टी और गोबर से आंगन की लिपाई
कच्चे घरों या बड़े आंगनों वाले पक्के घरों में भी दीवाली से ठीक पहले लिपाई का काम जरूर होता था। लाल मिट्टी और गाय के गोबर को मिलाकर पूरे आंगन और घर के मुख्य द्वार को लीपा जाता था। इसके पीछे की सोच यह थी कि मां लक्ष्मी उसी घर में प्रवेश करती हैं जो एकदम पवित्र और साफ हो। लिपाई के बाद उस गीली मिट्टी की जो सौंधी-सौंधी खुशबू हवा में घुलती थी, वो मन को एक अजीब सी शांति और खुशी देती थी।

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पानी में भीगते दीये और रुई की बत्तियां
इलेक्ट्रिक झालरों की चकाचौंध में मिट्टी के दीयों की जगह अब बहुत कम हो गई है। पहले दीवाली से दो-तीन दिन पहले कुम्हार के यहां से ढेरों कोरे दीये आते थे। उन्हें रात भर पानी की बाल्टी में डुबोकर रखा जाता था ताकि वे बाद में ज्यादा तेल न पिएं। फिर दोपहर के समय घर की औरतें, बुजुर्ग और बच्चे एक साथ बैठकर रुई की लंबी और गोल बत्तियां बनाते थे। सरसों के तेल में उन दीयों को भिगोकर पूरे घर की मुंडेर और छतों पर सजाने का जो सुकून था, वो आज की रेडीमेड लाइट्स में बिल्कुल नहीं है।
रसोई में बनने वाली मिठाइयों की महक
आज दीवाली का मतलब है बाजार से महंगी मिठाइयों के सजे हुए डिब्बे ले आना। पर पहले, दीवाली से एक हफ्ते पहले ही रसोई में डेरा डल जाता था। मैदे की मठरी, शक्करपारे, गुझिया, बेसन के लड्डू और सेव घर पर ही भारी मात्रा में बनाए जाते थे। देसी घी और चाशनी की खुशबू से पूरा मोहल्ला महक उठता था। स्टील के बड़े डिब्बों में भरकर रखी गई उन मिठाइयों को दीवाली के दिन से पहले ही छुप-छुप कर खाने का अपना ही एक अलग मजा था।
ग्रीटिंग कार्ड्स खरीदने का क्रेज
आज के दौर में व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड किए गए डिजिटल मैसेज में वो अहसास कहां, जो पुराने कागज के ग्रीटिंग कार्ड्स में हुआ करता था। दीवाली से पहले बुक स्टॉल पर जाकर दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए कार्ड चुनना एक बहुत बड़ा काम होता था। ग्लिटर वाले कार्ड्स, जिन पर सुनहरे अक्षरों में संदेश लिखे होते थे, उन्हें खरीदकर डाक से भेजा जाता था। जिस दिन डाकिया किसी का भेजा हुआ कार्ड लेकर दरवाजे पर आता, तो चेहरे पर एक अलग ही चमक आ जाती थी।
वक्त बहुत तेजी से बदला है और हमारे दीवाली मनाने का तरीका भी। आज की दीवाली ज्यादा चमकदार, आसान और आधुनिक जरूर हो गई है, लेकिन वो सादगी, वो घर की लिपाई-पुताई की महक, और वो अपनों के साथ मिलकर की गई छोटी-छोटी तैयारियां आज भी हमारे दिलों में सबसे खूबसूरत याद बनकर जिंदा हैं।
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