बुंदेलखंड की शान है 'आल्हा गायन', 12वीं सदी से चली आ रही है परंपरा, ये गीत सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे
बुंदेलखंड में आल्हा गायन की परंपरा सदियों पुरानी है। इसमें आल्हा और ऊदल भाइयों की कहानियां सुनाई जाती हैं।
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आल्हा गायन का दिलचस्प है इतिहास (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की संस्कृति में आल्हा गायन की परंपरा सदियों पुरानी है।सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी आल्हा गाया जाता है, जिसकी परंपरा सदियों पुरानी है। ये बुंदेलखंड की संस्कृति का अहम हिस्सा है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई?
आल्हा गायन सिर्फ एक लोकगीत या संगीत शैली नहीं है, बल्कि इसमें इतिहास और वीरों की वीरता की गाथा सुनाई जाती है। आइए जानें बुंदेलखंड की शान कहलाने वाले आल्हा गायन के बारे में।
क्या है आल्हा गायन?
आल्हा गायन मुख्य रूप से बुंदेलखंड के इलाकों में गाया जाता है और इसका इतिहास 12वीं सदी से जुड़ा है। इन गीतों में 12वीं सदी के महोबा के दो वीर भाइयों आल्हा और ऊदल के साहस, युद्ध कौशल और वीरता की कहानियों को बयां किया जाता है।
आल्हा गायन में 12वीं सदी के मशहूर कवि जगनिक के रचे आल्हा खंड को ढोलक और मंजीरे की थाप पर ऊंची आवाज में गाया जाता है।
कैसे हुई आल्हा गायन की शुरुआत?
आल्हा गायन की शुरुआत 12वीं शताब्दी में मानी जाती है। महोबा के चंदेल राजा के दरबार में जगनिक नाम के राजकवि थे। उन्होंने आल्हा और ऊदल की वीरता से प्रभावित होकर लोकभाषा में एक महाकाव्य की रचना की।
शुरुआत में महोबा के वीरों को युद्ध में प्रेरित करने के लिए आल्हा गायन किया जाता था, ताकि उनके अंदर नई ऊर्जा आए। धीरे-धीरे यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई और बुंदेलखंड की संस्कृति का हिस्सा बन गई।
आल्हा गायन का महत्व क्या है?
आल्हा गायन का मकसद लोगों के अंदर राष्ट्र प्रेम, वीरता और स्वाभिमान को जगाना है। इस गायन के जरिए लोगों ने आज भी बुंदेलखंड के इतिहास और चंदेल काल की संस्कृति को संजोकर रखा है। आमतौर पर इसे गांवों की चौपाल पर आयोजित किया जाता है, जहां लोग इकट्ठा होते हैं और आल्हा गायन का आनंद लेते हैं।
आल्हा गायन की खासियत क्या है?
आल्हा गायन की खासियत है कि ये वीर रस से भरा होता है। इसे बहुत ऊंची और कड़क आवाज में गाया जाता है कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन गीतों को मंजीरे, चिमटे और ढोलक पर गाया जाता है। इन वाद्य यंत्रों के साथ आल्हा गायन और भी बेहतरीन हो जाता है कि इन्हें सुनकर आंखों के सामने आल्हा और ऊदल की वीरता की तस्वीरें आ जाती हैं।
