कभी सिर्फ पुरुषों के पास था इसे गाने का अधिकार! बहुत दिलचस्प है छत्तीसगढ़ के 'पंडवानी' गायन की कहानी
पंडवानी छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोक गायन है, जिसमें पांडवों की कहानी को गीतों और नाटक के जरिए पेश किया जाता है।

मजेदार है छत्तीसगढ़ का पंडवानी गायन (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में पंडवानी की खास जगह है। इस लोकगीत में सिर्फ गायन नहीं, बल्कि नाटक भी शामिल है, जो इसे बेहद खास बनाता है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में ये लोकगीत रचा-बसा हुआ है, लेकिन क्या आप जानते हैं इस लोकगीत में सुनाया क्या जाता है और इसकी शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें कैसे पंडवानी शुरू हुआ।
क्या है पंडवानी का इतिहास?
पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक लोक-गाथा गायन कला है, जिसमें महाभारत के पांडवों के जीवन की कहानी सुनाई जाती है। पंडवानी का मतलब पांडव वाणी या पांडवों की कथा होती है। इसे बहुत ही दिलचस्प तरीके से सुनाया जाता है।
इसकी शुरुआत छत्तीसगढ़ की जनजातीय और ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि पहले पार्ध जनजाति के लोग गांव-गांव घूमकर अपने राजाओं को पांडवों की कथाएं गाकर सुनाया करते थे। ऐसा भी माना जाता है कि यहां की गोंड जनजाति बारिश के लिए महाभारत के भीम की कथाएं गाया करती थी। बाद में इस कला को मुख्य रूप से देवड़ा और सतनामी जैसी जातियों ने आगे बढ़ाया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये कला आगे बढ़ती गई और धीरे-धीरे इसने गायन के साथ-साथ लोक नाट्य का भी रूप ले लिया।
पंडवानी गायन की शैलियां
पंडवानी को दो तरीकों से गाया जाता है। वेदमती शैली में गायक बैठकर महाभारत की कथा गाते हैं। ये शैली बहुत शांत मानी जाती है और इसमें कथा गायन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। दूसरी शैली है कापालिक शैली। इसमें गायक खड़े होकर पूरी एनर्जी के साथ नाटक करते हुए महाभारत गाता है। इसमें गायन के साथ अभिनय पर भी जोर दिया जाता है।
सिर्फ पुरुषों का गायन था पंडवानी
शुरुआत में पंडवानी सिर्फ पुरुष गाया करते थे। महिलाओं को इसे सीखने की आजादी थी, लेकिन वे इसे गा सकती थीं। इसका अधिकार सिर्फ पुरुषों के पास था। हालांकि, वक्त के साथ अब इसमें बदलाव आ चुका है। डॉ. तीजन बाई के पंडवानी गायन ने कई महिलाओं के लिए इस गायन में दरवाजे खोले।
पंडवानी की खासियत क्या है?
पंडवानी गायन में गायक हाथ में तंबूरा या एकतारा लेता है, जिसे बजाते हुए वो कथा सुनाता है। ये तंबूरा नाटक में भी इस्तेमाल होता है। गायक इसे कभी भीम की गदा बना लेता है, तो कभी अर्जुन का धनुष, तो कभी ढाल। पंडवानी सिर्फ एक ही गायक गाता है, जो नाटक भी करता है और गाता भी है। इसके साथ तबला, मंजीरा और ढोलक बजाने के लिए संगीतकार होते हैं।
इन वाद्य यंत्रों की धुन से पंडवानी गायन का मजा दोगुना हो जाता है और नाटक भी काफी ड्रामैटिक लगता है, जो दर्शकों को बांधे रखता है। पंडावनी की एक खासियत ये भी है कि इसे छत्तीसगढ़ की लोक बोली में गाया जाता है। इस कारण वहां की संस्कृति की और भी खूबसूरत झलक इस गायन में देखने को मिलता है।
