भांगड़ा-गिद्दा ही नहीं, पंजाब का ये अनोखा डांस भी है मशहूर; बलूच जनजातियों से जुड़ा है 'झूमर' नृत्य का इतिहास
पंजाब के लोक नृत्यों में सिर्फ भांगड़ा और गिद्दा शामिल नहीं हैं। यहां का झूमर नृत्य भी काफी खास है।

कैसे शुरू हुआ पंजाब का लोक नृत्य झूमर? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पंजाब का लोक नृत्य सुनकर दिमाग में सबसे पहले भांगड़ा और गिद्दा ही आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं यहां के फोक डांस में झूमर भी शामिल है।
झूमर भांगड़ा और गिद्दा से काफी अलग होता है। ढोल और लोकगीतों पर होने वाला ये नृत्य पंजाब की संस्कृति का अहम हिस्सा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और क्यों ये लोक नृत्य इतना खास है? आइए जानें क्या है झूमर का इतिहास और खासियत।
कैसे हुई झूमर की शुरुआत?
झूमर धीमी ताल पर किया जाने वाला नृत्य है। झूमर झूमने शब्द से मिला है, जिसका मतबल है मस्ती से लहराना या झूलना। इस नृत्य में धीमी ताल में लोग झूमते हुए डांस करते हैं। इसलिए इसे झूमर कहा जाता है। इस डांस की शुरुआत अविभाजित पंजाब के सैंडल बार क्षेत्र में हुई थी, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।
ऐतिहासिक रूप से इस नृत्य की शुरुआत बलूच और मवेशी पालने वाली जनजातियों ने की थी। ये चरवाहे दूर-दराज के जंगलों और मैदानों से मवेशी चराकर लौटते थे, तो शाम के समय एक साथ इकट्ठा होकर ढोल की थाप पर डांस किया करते। इसी से झूमर डांस की शुरुआत हुई। खेतों में अच्छी फसल उगने पर भी झूमर डांस किया जाने लगा।
क्यों खास है झूमर डांस?
झूमर हमेशा धीमी ताल पर किया जाता है। डांस की शुरुआत धीमी होती है, धीरे-धीरे चाल हल्की तेज होती है। इस नृत्य में नर्तक गोल घेरे में घूमते हुए डांस करते हैं और गोले के बीच में ढोलकिया होता है, जो ढोल बजाता है।
इस नृत्य को मुख्य रूप से पुरुष ही करते हैं। वे कुर्ता, धोती, रंगीन कट-स्लीव जैकेट और सिर पर कलगीदार पगड़ी पहनकर ये डांस करते हैं।
कैसे किया जाता है ये डांस?
झूमर करने का एक पैटर्न होता है। इसमें हाथों, पैरों और सिर को एक समान लय में हिलाते हुए डांस किया जाता है। ढोलिया धीमी आवाज पर ढोल बजाना शुरू करता है, जिसे झूमर ताल कहा जाता है। नर्तक अपने दोनों हाथ उठाते हैं और पैरों को लय में आगे-पीछे करते हुए डांस करते हैं। इस नृत्य में पंजाबी लोकगीत और बोलियां गाई जाती हैं, जो ढोलक की थाप के साथ और भी मजेदार हो जाती हैं।
