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बुरी शक्तियों से बचने के लिए किया जाता है 'डाकला', देवी के आह्वान से जुड़ा है गुजरात के इस लोक नृत्य का नाता

Published: Sun, 23 Aug 2026 01:58 PM (IST)Updated: Mon, 24 Aug 2026 02:37 PM (IST)

गुजरात का लोक नृत्य डाकला नवरात्रि के दौरान देवी आराधना के लिए किया जाता है। इसे डाक की थाप पर किया जाता है।

क्यों खास है गुजरात का डाकला? (AI Generated Image)

क्यों खास है गुजरात का डाकला? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गुजरात के लोक नृत्यों में डाकला की खास जगह है। नवरात्रि के दौरान किया जाने वाला ये नृत्य गरबा से अलग तरीके से किया जाता है, लेकिन इसका मकसद भी देवी आराधना ही होता है। 

इस नृत्य से मां अंबे के चामुंडा और मेलडी स्वरूपों का आह्वान किया जाता है। इस नृत्य के शुरुआत के पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है और बुरी शक्तियों से बचाव से जुड़ी है। आइए जानें डाकला नृत्य की शुरुआत कैसे हुई और ये क्यों किया जाता है। 

चामुंडा देवी की आराधना के लिए बना डाकला

डाकला की जड़ें गुजरात की जनजातीय और लोक परंपराओं से जुड़ा है। डाकला का नाम एक खास वाद्य यंत्र से जुड़ा है, जो दिखने में डमरू जैसा लगता है, लेकिन इसका आकार थोड़ा बड़ा होता है। इस वाद्य यंत्र को डाक कहा जाता है। इस नृत्य की शुरुआत माताजी के चामुंडा, काली और मेलड़ी जैसे स्वरूपों की साधना और पूजा-अर्चना के लिए हुई थी। 

पुराने समय में गांवों को प्राकृतिक आपदाएं और बीमारियों से बचने के लिए तो जनजातीय समुदाय के लोग देवी को प्रसन्न करने के लिए डाक बजाते थे। इसकी तेज और गूंजती हुई आवाज पर एक नृत्य की शुरुआत हुई, जिसे आगे चलकर डाकला कहा गया। 

क्या है इस नृत्य की खासियत?

डाकला नृत्य अपनी तेज और ऊर्जा से भरी ताल के लिए जाना जाता है। देवी के आह्वान के लिए गोल घेरे में तेज गति पर घूमते हुए डाकला नृत्य किया जाता है। सालों से डाक बजाने और डाकला के लिए गीत गाने की परंपरा चलती आई है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में डाकला का खास महत्व है। 

कैसे किया जाता है डाकला?

डाकला, गरबा के धीमी चाल से बिल्कुल अलग होता है। डाक की धुन पर बहुत तेज गति के साथ नृत्य किया जाता है। इस दौरान देवी के मंत्रोच्चारण और गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में भी देवी का आह्वान किया जाता है कि वे भी डाकला खेलने आएं। 

“रमती आवे माडी रमती आवे, आज मात मेलड़ी रमती आवे…” बहुत मशहूर डाकला गीत है, जो नवरात्रि के दिनों में खूब बजाया जाता है। ऐसे ही गीतों पर लोग नृत्य करते हैं और देवी की आराधना करते हैं। नवरात्रि में माता-जी के मंडपों में डाकला आयोजन किया जाता है, जिसमें गरबा की ही तरह लोग रात के समय नृत्य करते हैं और चामुंडा मां की साधना करते हैं।