दूसरों को देखकर जीने वाले कभी नहीं रहते खुश! प्रेमानंद महाराज ने बताया सुखी जीवन का सिंपल फॉर्मूला
संत प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि दूसरों को देखकर जीने वाले कभी खुश नहीं रह सकते, क्योंकि यह ईर्ष्या का जीवन है। ...और पढ़ें

जिंदगी को ईर्ष्या के दलदल में धकेल सकती है दूसरों से खुद की तुलना की आदत (Image Source: Instagram & Magnific)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी दूसरों की सुख-सुविधाओं को देखकर अपनी जिंदगी से निराश हो जाते हैं? अगर हां, तो यह आर्टिकल खास आपके लिए ही है।
संत प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि दूसरों को देखकर और उनकी नकल करके जीने वाले लोग कभी भी खुश नहीं रह सकते। दूसरों को देखकर जीना केवल ईर्ष्या का जीवन है। इस बात को गहराई से समझाने के लिए उन्होंने एक पिता और पुत्र की बड़ी ही रोचक कहानी सुनाई है। आइए जानते हैं।
पैदल से शुरू हुआ सफर और साइकिल की जिद
महाराज जी ने बताया कि एक लड़का था जो रोज पैदल ही अपने स्कूल जाया करता था। एक दिन उसने रास्ते में एक दूसरे लड़के को साइकिल चलाते हुए देखा। उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा। उसने तुरंत अपने पिता से साइकिल दिलाने की मांग की। पिता ने उसकी बात मानी और उसे एक साइकिल दिला दी।
फिर जगी मोटरसाइकिल और कार की चाहत
कुछ दिन मजे से साइकिल चलाने के बाद, उस लड़के ने किसी को स्कूटर चलाते हुए देखा। उसने सोचा कि इसमें तो पैर भी नहीं चलाने पड़ते, सिर्फ हाथों का ही काम है। उसने घर जाकर साफ कह दिया कि कल से वह स्कूल नहीं जाएगा। जब पिता ने कारण पूछा, तो उसने कहा कि उसे स्कूटर या मोटरसाइकिल चाहिए। पिता ने उसकी यह जिद भी पूरी कर दी और उसे मोटरसाइकिल मिल गई।
कुछ दिनों बाद जब वह मोटरसाइकिल से जा रहा था, तो अचानक बारिश होने लगी और तेज हवा चलने लगी जिससे वह पूरी तरह भीग गया। तभी उसकी नजर एक कार पर पड़ी, जिसके शीशे पूरी तरह से बंद थे और अंदर बैठा इंसान एकदम आराम से था। लड़के को लगा कि यह तो बिल्कुल घर में बैठने जैसा है। उसने घर जाकर अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और पिता से कहा कि अब जब आप कार खरीदेंगे, तभी मैं स्कूल जाऊंगा। पिता ने उसे कार भी दिला दी।
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ट्रैफिक जाम और हेलीकॉप्टर की मांग
कार मिलने के बाद एक दिन वह भारी ट्रैफिक जाम में फंस गया। जाम इतना लंबा था कि वहां से बाहर निकलने का कोई चांस ही नहीं था। तभी उसने अपने सिर के ऊपर से एक हेलीकॉप्टर को उड़ते हुए देखा। उसने सोचा, "यह तो सबसे बढ़िया चीज है।" उसने अपने पिता से जाकर कहा, "कार तो ठीक है, लेकिन कल जब आप हेलीकॉप्टर खरीदेंगे, तब मैं उससे स्कूल जाऊंगा।"
लड़के की इस बेतुकी मांग पर पिता का सब्र टूट गया। उन्होंने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया।
क्या है इस कहानी की असली सीख?
प्रेमानंद जी महाराज इस कहानी के जरिए समझाते हैं कि आज हमारी स्थिति भी बिल्कुल इसी लड़के जैसी हो गई है। अगर हम लगातार दूसरों को ही देखते रहेंगे, तो इसकी कोई सीमा नहीं है। हम एक के बाद एक नई चीजों और लोगों को देखते रहेंगे और मन में कभी शांति नहीं मिलेगी।
सुखी जीवन का आसान फॉर्मूला
महाराज जी कहते हैं कि आपके पास जो भी है, उसमें संतुष्ट रहना सीखें। जब इंसान के पास 'संतोष' आ जाता है, तो बाकी सारा धन उसके सामने एक समान हो जाता है। इसलिए, हमेशा संतोषी बनें, क्योंकि यही असली शांति और खुशी का एकमात्र रास्ता है।