पीढ़ियां बदलीं, संगीत बदला... मगर नहीं उतरा इस पंजाबी लोकगीत का खुमार, सुनकर डांस फ्लोर की ओर बढ़ जाते हैं कदम
इस गाने में एक ऐसा जादुई करंट है, जो कोने में बैठे सबसे शर्मीले इंसान को भी डांस फ्लोर पर खींच लाता है।

शादियों की जान है 'काला शा काला' (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिना नाच-गाने और ढोलक की थाप के क्या कभी शादियां पूरी हो सकती हैं? बिल्कुल नहीं। खासकर उत्तर भारत के संगीत फंक्शन तो उस एक सदाबहार ट्रैक के बिना एकदम अधूरे हैं, और वो है- 'काला शा काला'। यह धुन बजते ही जैसे हवा में एक अलग ही एनर्जी घुल जाती है और न नाचने वालों के पैर भी खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं।
आज भले ही यह गाना डीजे की जान और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा ट्रेंड बन चुका है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यह किसी फिल्म के लिए नहीं लिखा गया था। यह तो पंजाब का एक ठेठ लोकगीत है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि बाहर से छेड़छाड़ और हंसी-मजाक से भरा लगने वाला यह गाना अपने भीतर एक बेहद प्यारा और गहरा फलसफा समेटे हुए है। आइए, आज इसी मशहूर गाने की असल कहानी जानते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
क्या है 'काला शा काला' का असली अर्थ?
इस लोकगीत की सबसे मशहूर लाइन है- "काला शा काला, मेरा काला है सरदार, गोरयां नूं दफा करो..."
अगर इसके शाब्दिक अर्थ की बात करें, तो इसमें एक लड़की या नई-नवेली दुल्हन बड़ी ही बेबाकी के साथ अपने सांवले पति की तारीफ कर रही है। वह अपनी सखियों से कहती है कि "मेरा सरदार (पति) भले ही सांवला है, लेकिन वह मेरे लिए सबसे अच्छा है। इन गोरे रंग वालों को मेरी नजरों से दूर हटाओ (दफा करो)।"
हमारे भारतीय समाज में जहां हमेशा से गोरे रंग को लेकर एक अलग ही जुनून देखा गया है, वहां सदियों पहले रचे गए इस गीत ने बड़ी ही खूबसूरती और मस्ती के साथ समाज के रंगभेद पर करारा प्रहार किया था।
लोकगीत में छिपा है पुराने जमाने का 'वुमन एम्पावरमेंट'
पुराने समय में जब समाज में महिलाओं को अपनी बात खुलकर कहने की ज्यादा आजादी नहीं थी, तब ये विवाह गीत ही उनके लिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने का जरिया हुआ करते थे। इस गीत के जरिए एक महिला समाज के तय किए गए 'गोरेपन के पैमाने' को नकार कर अपने सांवले जीवनसाथी के प्रति अपने अटूट प्यार का इजहार करती है।
यह गाना सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं गाया जाता, बल्कि यह एक तरह का मीठा विरोध भी है। जब दुल्हन हंसते हुए कहती है 'गोरयां नूं दफा करो', तो वह समाज को यह संदेश देती है कि सच्चा प्यार और इंसान की सीरत बाहरी रंग-रूप से कहीं बढ़कर होती है।
शादियों में गिद्दा और हंसी-ठिठोली का है अहम हिस्सा
शादी वाले घर में जब महिलाएं आंगन में ढोलक लेकर बैठती हैं, तो यह गीत सिर्फ एक गाना नहीं रहता, बल्कि एक पूरी महफिल बन जाता है। इन गीतों में सास-ससुर, ननद-भाभी और देवर के रिश्तों की मीठी नोकझोंक होती है।
गिद्दा में जब कोई महिला बीच में आकर इस गीत की बोली डालती है, तो बाकी सभी महिलाएं एक साथ कोरस में उसका साथ देती हैं। यह गानों के जरिए दो परिवारों के बीच की झिझक खोलने और एक-दूसरे के करीब आने का एक बहुत प्यारा और सुरक्षित तरीका होता था। शादी के भारी और तनावभरे माहौल को हल्का करने में ये लोकगीत जादू की तरह काम करते हैं।
पिंड के आंगन से बॉलीवुड और रील्स तक का सफर
वक्त के साथ इस लोकगीत का संगीत जरूर बदला, लेकिन इसकी रूह आज भी वही है। परंपरागत रूप से यह गीत पंजाब के ग्रामीण उत्सवों का हिस्सा था, जहां महिलाएं एक साथ जमा होकर इसे गाती थीं। हालांकि, आज अपनी सादगी और कमाल की लय के कारण यह गीत पंजाब के पिंड से निकलकर बड़े शहरों के पब तक पहुंच चुका है।
बॉलीवुड ने भी इस गीत को कई फिल्मों में शानदार तरीके से रीक्रिएट किया है और आज की युवा पीढ़ी इसे अपने संगीत फंक्शन का वेडिंग एंथम मानती है।
घर-घर से लेकर फिल्मों तक मचाया धमाल
'काला शा काला' मूल रूप से एक पारंपरिक पंजाबी लोकगीत है, इसलिए इसका कोई एक मूल गायक या रचयिता नहीं है। यह पीढ़ियों से पंजाब में शादियों और गिद्दे के दौरान महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से गाया जाता रहा है। हालांकि, इसे व्यावसायिक रूप से रिकॉर्ड करके दुनिया भर में मशहूर करने का श्रेय इन गायकों को जाता है:
- सुरिंदर कौर और प्रकाश कौर: पंजाब की इन मशहूर बहनों की जोड़ी ने सबसे पहले इस लोकगीत को अपनी आवाज देकर घर-घर में लोकप्रिय बनाया।
- आधुनिक और बॉलीवुड संस्करण: आज के समय में इस गाने को नेहा कक्कड़, नवराज हंस और एमी विर्क जैसे गायकों ने फिल्मों और म्यूजिक एल्बम्स के लिए नए अंदाज में गाया है।
यह भी पढ़ें- गिद्दा में इस लोकगीत के बोल सुनते ही झूम उठती हैं कुड़ियां, असली मतलब पता चले; तो दोगुना हो जाएगा मजा
