मलमास कैसे बना श्रीहरि का प्रिय पुरुषोत्तम मास? जानिए इस महीने में साधना और खानपान का सही तरीका
'पुरुषोत्तम मास' (अधिक मास) भगवान विष्णु की साधना का पवित्र काल है। लोकसंस्कृति ने इसे भजन-कीर्तन के विधान से जोड़ दिया। इस बार अधिक मास के ज्येष्ठ से ...और पढ़ें

जेठ की गर्मी का 'प्रसाद' हैं ये रसीले फल (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र, दुर्लभ और पुण्यदायी मास है। शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य और चंद्र मास की गणना में अंतर उत्पन्न हुआ, तब संतुलन हेतु एक अतिरिक्त मास प्रकट हुआ।
प्रारंभ में उपेक्षित होने के कारण इसे 'मलमास' कहा गया, लेकिन भगवान श्रीहरि विष्णु ने इसे अपना स्वरूप और नाम प्रदान कर 'पुरुषोत्तम मास' के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया। तभी से यह मास भगवान विष्णु को समर्पित होकर भक्ति, सेवा और साधना का श्रेष्ठ काल माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सौर वर्ष (365 दिन) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच के 11 दिनों के अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे साल यह अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है।
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यह एक महीना संसार की भागदौड़ से रुककर अपनी माटी, अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों की ओर लौटने का ईश्वरीय निमंत्रण है। आप देखेंगे कि पुरुषोत्तम मास में गांव-घरों में अत्यंत श्रद्धा से भागवत बैठाई जाती है अर्थात श्रीमद्भागवत की कथा की परंपरा है। इसी प्रकार श्रीरामचरितमानस व सुंदरकांड का पाठ किया जाता है, चौपाइयां गाई जाती हैं और सब मिल-बैठकर कीर्तन करते हैं।
लोकमानस का विश्वास है कि पुरुषोत्तम मास में जप-तप, कथा श्रवण, भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सेवा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पुरुषोत्तम मास के उत्सवों में, जेठ की तपतपाती गर्मी जैसे इस बार ज्येष्ठ अधिक मास है, भी बाधा नही बनने पाती है।
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प्रसाद में प्रकृति का उपहार
आइए जरा पुरुषोत्तम मास के बहाने जेठ महीने की बात की जाए, लोकगीतों में जेठ महीने का वर्णन कुछ इस तरह मिलता है:
जेठ महीनवा अकास जरि लागे सरसर चलेला समीर
टप टप चूवे तन से पसीनवा झुराए गइले तलवा में नीर
जेठ का महीना ऐसा है जिसमें आकाश गर्मी से जलता प्रतीत होता है, सन सन लू चल रही है। गर्मी से तन से पसीना छूट रहा है और ताल तलैया में जल सूख गया है।
जेठ का तत्सम शब्द है ज्येष्ठ! अर्थात बड़ा। 12 महीनों में जेठ सबसे बड़ा माना गया है क्योंकि जेठ महीने में दिन बड़ा होता है, कारण है सूर्य से नजदीकी। सूर्य की निकटता के चलते भीषण गर्मी जेठ महीने का प्रसाद है। जेठ का महीना यानी जब प्राणी जगत सूर्य के प्रकोप से बचने का तीर ठिकाना ढूंढता है, आषाढ़ की प्रतीक्षा में, वर्षा की फुहारों की प्रतीक्षा में।
प्रकृति ने भी हर मौसम के अनुकूल उपहार रचे हैं। फलों का राजा आम, जेठ की गर्मी का सबसे अनमोल उपहार है। दशहरी हो या लंगड़ा, केसर हो या हापुस, रटौल, सफेदा, गौड़जीत, मालदा, फजली, हर मिट्टी में पकते रसीले अलग अलग आम की स्वादिष्ट प्रजातियां। इस मौसम में जल की कमी होती है तो भूमि जेठ की ताप से पके रसीले तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी जैसे फल प्रदान करती है।
सबकी मनभावन लीची भी इसी मौसम में अपनी लाली बिखेरती दिखती है। सब्जियों की बात करें तो वो भी रसभरी जैसे टिंडा, तरोई, लौकी, परवल आदि, जिनमें जल की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। इस मौसम में गर्मी के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सतुआ पीने-खाने की भी परंपरा है।
(लेखिका पद्मश्री से अलंकृत लोकगायिका हैं)
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