सिर पर 7-8 घड़े, पैर नंगी तलवारों और थाली के किनारों पर... ऐसा है राजस्थान का 300 साल पुराना 'भवाई लोकनृत्य'
राजस्थान का भवाई लोकनृत्य खतरनाक स्टंट्स के लिए दुनियाभर में जाना जाता है।

राजस्थान का भवाई लोक नृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान का एक लोकनृत्य ऐसा भी है जिसमें वहां की संस्कृति और जांबाजी दोनों की झलक देखने को मिलती है। हम बात कर रहे हैं यहां के भवाई लोकनृत्य की जिसमें महिलाएं सिर पर एक के ऊपर एक मटके रखकर कभी कांच के टुकड़ों पर चलती हैं, कभी थाली के किनारों पर तो कभी तलवार की धार पर।
भवाई जहां एक तरफ राजस्थानी नृत्य, पहनावे और गीतों की झलक दिखाता है तो वहीं इसमें किए जाने वाले स्टंट्स संतुलन और हौसले का प्रतीक हैं।
राजस्थान का भवाई लोक नृत्य
राजस्थान के भवाई नृत्य की बात ही निराली है क्योंकि जब एक कलाकार सिर पर 7-8 घड़ों को रखकर नंगी तलवार या कांच के टुकड़ों पर संतुलन बनाते हुए थिरकता है तो वह दृश्य देखने लायक होता है। मूल रूप से यह नृत्य राजस्थान के उदयपुर, चित्तौड़गढ़ वाले मेवाड़ क्षेत्र और जोधपुर बाड़मेर वाले मारवाड़ क्षेत्र में किया जाता है। वहीं, गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में भी यह नृत्य बेहद लोकप्रिय है।
किसने की भवाई नृत्य की शुरुआत?
भवाई नृत्य को 300 साल पहले शुरू करने का श्रेय केकड़ी नामक स्थान से संबंध रखने वाले बाघोजी जाट को दिया जाता है जिन्हें लोग यहां नागोजी जाट की नाम से भी जानते हैं।
बताते चलें कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस नृत्य को आगे बढ़ाने में जाट, भील, मीणा, कालबेलिया और कुम्हार जाति के कलाकारों ने भी मदद की। कहते हैं कि पुराने समय में भवाई महिलाएं नहीं बल्कि पुरुष किया करते थे, पर समय के साथ बदलाव हुआ और जांबाजी दिखाने का यह काम औरतें करने लगीं।
भवाई नृत्य में किए जाने वाले स्टंट्स
इस नृत्य में कई खतरनाक स्टंट्स किए जाते हैं जिसकी वजह से यह दुनियाभर में मशहूर है। इनमें नंगी तलवार की धार पर चलना, 7-8 घड़ों का संतुलन बनाना, कांच के टुकड़ों पर चलना, मुंह से रुमाल उठाना और थाली के किनारों पर चलने जैसे स्टंट्स शामिल हैं। जैसे-जैसे गानों की लय तेज होती जाती है, वैसे-वैसे नर्तकियों के थिरकने की गति भी बढ़ती जाती है।
भवाई में लोकगीतों और वाद्य यंत्रों का खास महत्व
इसमें स्टंट्स के साथ-साथ लोकगीतों और वाद्य यंत्रों का भी खास महत्व है। महिलाएं राजस्थान के ग्रामीण जीवन के संघर्ष और पनिहारी लोकगीत गाते हुए यह नृत्य करती हैं। इस तरह बोलियों और छंदों से नृत्य की महफिल आगे बढ़ती रहती है। वहीं, वाद्य यंत्रों की बात करें तो ढोलक, हारमोनियम, सारंगी, झांझर, पखावज और भुंगल का उपयोग किया जाता है।
