अंटार्कटिका में ग्लेशियर से कैसे निकलता है खून जैसा लाल पानी? क्या है 'ब्लड फॉल्स' का असली रहस्य
अंटार्कटिका में एक ऐसा झरना बहता है, जिसका पानी खून की तरह बिल्कुल लाल है। इस झरने को ब्लड फॉल्स कहा जाता है। ...और पढ़ें

अंटार्कटिका के इस झरने से आता है लाल पानी (Picture Courtesy: Instagram)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अंटार्कटिका का नाम लेते ही दिमाग में सबसे पहली तस्वीर बनती है चारों तरफ फैली सफेद बर्फ की चादर और ऊंचे-ऊंचे ग्लेशियर्स की। लेकिन क्या आप जानते हैं बर्फ से ढके इस महाद्वीप में एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जो किसी हॉरर फिल्म जैसा लगता है?
दरअसल, अंटार्कटिका के टेलर ग्लेशियर से एक ऐसा झरना बहता है, जिसका पानी खून की तरह बिल्कुल लाल है। बर्फ की सफेद वादियों के बीच बहते इस झरने को ब्लड फॉल्स कहा जाता है। इस बारे में सुनकर अक्सर लोग हैरान हो जाते हैं कि इस बेहद ठंडे इलाके में खून जैसा लाल पानी कहां से और क्यों आ रहा है? आइए जानते हैं इस कुदरती अजूबे के पीछे का पूरा वैज्ञानिक सच।
कब और किसने की इसकी खोज?
इस अजीबोगरीब झरने की खोज साल 1911 में ऑस्ट्रेलियाई भूवैज्ञानिक ग्रिफिथ टेलर ने की थी। उन्हीं के नाम पर इस ग्लेशियर का नाम टेलर ग्लेशियर रखा गया। जब उन्होंने पहली बार बर्फ के पहाड़ से लाल रंग का पानी गिरते देखा, तो वे हैरान रह गए। उस दौर में तकनीक इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए शुरुआती अनुमान यह लगाया गया कि पानी का यह लाल रंग बर्फ के नीचे मौजूद किसी खास तरह के रेड एल्गा के कारण हो सकता है, लेकिन वक्त के साथ यह थ्योरी गलत साबित हुई।
क्या है खून जैसे लाल पानी का सच?
जैसे-जैसे विज्ञान ने प्रगति की, वैज्ञानिकों ने इस झरने के पानी के सैंपल लिए और आधुनिक उपकरणों से जांच शुरू की। रिसर्च में जो सच सामने आया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। असल में, इस ग्लेशियर के लगभग 1300 फीट नीचे एक प्राचीन नमक की झील दबी हुई है। यह झील करीब 15 से 20 लाख साल पुरानी मानी जाती है।
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समय के साथ जब टेलर ग्लेशियर का आकार बढ़ा, तो उसने इस झील को पूरी तरह से बर्फ के नीचे कैद कर दिया। लंबे समय तक रोशनी और ऑक्सीजन के संपर्क में न आने के कारण इस झरने का पानी काफी खारा हो गया और इस कारण यह कम तापमान में भी नहीं जमता। इस झरने की एक खास बात यह भी है कि इसके पानी में आयरन की मात्रा काफी ज्यादा है।
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(Picture Courtesy: Instagram)
हवा के संपर्क में आते ही बदल जाता है रंग
अब सवाल उठता है कि अगर पानी बर्फ के नीचे है, तो बाहर आकर यह लाल कैसे होता है? दरअसल, जब यह बहुत ज्यादा आयरन और नमक वाला पानी ग्लेशियर की दरारों से होता हुआ धीरे-धीरे बाहर निकलता है, तो यह ऑक्सीजन के संपर्क में आता है। जैसे ही पानी में मौजूद आयरन ऑक्सीजन से मिलता है, उनके बीच एक केमिकल रिएक्शन होती है जिसे ऑक्सीडेशन कहते हैं। इसके कारण पानी का रंग लाल हो जाता है। जब यह लाल पानी सफेद बर्फ पर गिरता है, तो ऐसा लगता है जैसे ग्लेशियर से खून बह रहा हो।
वैज्ञानिकों के लिए क्यों खास है ब्लड फॉल्स?
ब्लड फॉल्स सिर्फ सैलानियों के आकर्षण का केंद्र नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए भी स्टडी की एक बड़ी जगह है। वैज्ञानिकों को इस बेहद नमकीन, बिना ऑक्सीजन और बिना धूप वाली झील के भीतर भी कुछ ऐसे बैक्टीरिया मिले हैं, जो लाखों सालों से वहां जिंदा हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर धरती पर ऐसे बेहद मुश्किल हालातों में भी जीवन पनप सकता है, तो सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर भी बर्फ के नीचे जीवन मौजूद हो सकता है।