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    बकरे की आंत और घोड़े के बाल से बनाया जाता है कमायचा, इसकी साज में बसती है राजस्थानी लोकगीतों की आत्मा

    Updated: Tue, 23 Jun 2026 10:00 AM (IST)

    राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र कमायचा अपनी मधुर धुन से पुरानी और नई पीढ़ी को जोड़ने का काम कर रही है। ...और पढ़ें

    राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र है कमायचा (AI Generated Image)

    राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र है कमायचा (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान अपने किलों और महलों के साथ-साथ अपने लोकगीतों और संस्कृति के लिए भी काफी मशहूर है। राजस्थानी संगीत की दुनिया में एक ऐसा ही वाद्य यंत्र है, जिसे मांगणियार समुदाय के संगीत की आत्मा कहा जाता है। हम बात कर रहे हैं कमायचा की।

    सदियों पुराने इस वाद्य यंत्र ने अपनी मीठी धुन से इतिहास, कहानियों और परंपराओं को जिंदा रखा हुआ है। रेगिस्तान की मिट्टी में गूंजने वाली इसकी तान आज भी पुरानी और नई पीढ़ी को आपस में जोड़ने का काम कर रही है। आइए जानें इस वाद्य यंत्र से जुड़ी कुछ खास बातें। 

    जैसलमेर और बाड़मेर की धड़कन 

    कमायचा को ज्यादातर राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में, खासकर जैसलमेर और बाड़मेर में बजाया जाता है। यहां के मांगणियार और दूसरे प्रमुख समुदाय इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को बजाते हैं। कई तारों और मधुर लहरियों वाला ये वाद्य यंत्र मनोरंजन का साधन होने के साथ-साथ इन जगहों की जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक माना जाता है।

    कैसे बनता है यह अनोखा कमायचा?

    कमायचा से निकलने वाला संगीत जितना मधुर है, उतनी ही दिलचस्प इसकी बनावट भी है। इसे बनाने और बजाने में कई खास चीजों का इस्तेमला होता है। कमायचा को आमतौर पर 17 तारों से बनाया जाता है। इसमें 3 मुख्य तार होते हैं, जिन्हें बकरे की आंत से तैयार किया जाता है और इन्हीं से इस साज की धुन निकलती है। इसके साथ 14 सहायक तार होते हैं, जो स्टील के बने होते हैं। 

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    इस वाद्य यंत्र को आम की नर्म लकड़ी से तराशा जाता है और इसे जानवरों की खाल से मढ़ा जाता है। इसे बजाने के लिए जिस गज का इस्तेमाल होता है वो घोड़े के बाल से बने होते हैं और इसका ब्रिज शीशम की लकड़ी से बनता है, जिसे घोरी कहा जाता है।

    गांवों से अंतरराष्ट्रीय मंच का सफर

    इस वाद्य यंत्र को पूरी दुनिया में पहचान दिलाने का पूरा श्रेय राजस्थान के दिग्गज कलाकारों को जाता है। साकर खान और दरे खान जैसे महान फनकारों ने अपने परिवार की इस सदियों पुरानी विरासत को देश-विदेशों में मशहूर किया। कमायचा और लोक गायन के जरिए राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहुंचाने का श्रेय इन्हीं कलाकारों को जाता है।