सिर्फ बारिश का स्वागत नहीं! सावन में महिलाएं क्यों करती हैं बिहार का मशहूर कजरी नृत्य? दिलचस्प है इसकी कहानी
सावन के महीने में कजरी नृत्य किया जाता है, जो बिहार का मशहूर लोक नृत्य है। ...और पढ़ें

क्यों इतना खास है कजरी नृत्य? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आषाढ़ और सावन के महीने में जब आसमान काले बादलों से ढंक जाता है, जब बिहार में कजरी की तान सुनाई देती है। बारिश के महीने में कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती है, बल्कि महिलाएं कजरी नृत्य भी करती हैं। ये नृत्य बिहार की लोक संस्कृति का अहम हिस्सा है।
कजरी मुख्य रूप से महिलाएं ही करती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कजरी क्यों किया जाता है? इस नृत्य के पीछे प्रकृति, प्रेम और विरह जैसी भावनाएं छिपी होती हैं। आइए जानें कजरी की कहानी।
क्यों किया जाता है कजरी?
ग्रामीण जीवन में बारिश सिर्फ सुहाना मौसम नहीं होता। ये खेती के लिए जरूरी है, जो वहां के लोगों की रोजी-रोटी का साधन है। इसलिए बारिश के मौसम में प्रकृति का धन्यवाद करने और वर्षा ऋतु का स्वागत करने के लिए कजरी किया जाता है।
प्रेम और विरह की भावना
हालांकि, कजरी के पीछे और भी कारण छिपे हैं। पुराने समय में पुरुष काम के सिलसिले में घर से दूर शहर जाते थे। इस दौरान उनकी पत्नियां या प्रेमिकाएं घर पर उनका इंतजार किया करती थीं। इस सुहाने मौसम में जब उन्हें अपने प्रेमी की याद आती, तो वियोग के दर्द और उनसे मिलने की आस को महिलाएं कजरी नृत्य और गीतों के जरिए जाहिर करतीं। इसी तरह बारिश के महीने में कजरी नृत्य करने और गाने की परंपरा शुरू हुई और इसलिए इस नृत्य को आमतौर पर महिलाएं ही करती हैं।
झूले और एकता की भावना
सावन के महीने में बागों में झूले डाले जाते हैं और महिलाएं एक साथ मिलकर झूला झूलती हैं। इस दौरान वे गोल घेरा बनाती हैं और साथ मिलकर नाचती-गाती हैं, जो उनके मन की खुशी को जाहिर करता है। कजरी नृत्य अकेले नहीं किया जाता, बल्कि समूह में होता है। इससे महिलाओं को रोज के कामों के अलावा आपस में मिलने-जुलने का समय मिलता और एकता की भावना पैदा होती।
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कजरी की शुरुआत कैसे हुई?
कजरी शब्द कजरा से निकला है, जिसका मतलब होता है काजल या काला, जो काजल जैसे काले बादलों से आया है। बारिश के महीने में आकाश में घिरने वाले काले बादलों के नाम पर इस नृत्य का नाम कजरी पड़ा। सावन में काले बादल घिरने पर महिलाएं मिलकर नाचती-गाती हैं, इसलिए इस नृत्य को कजरी कहा जाता है।
आज कजरी नृत्य और गाने की परंपरा बिहार और उत्तर-प्रदेश के कुछ इलाकों में घुल-मिल चुकी है और सावन आते ही कजरी की शुरुआत हो जाती है।
क्या है कजरी नृत्य की खासियत?
कजरी नृत्य के लिए महिलाएं हरे या लाल जैसे रंगों की साड़ियां पहनती हैं, हाथों में हरी चूड़ियां और माथे पर बिंदी लगाकर साथ मिलकर कजरी करती हैं। इस नृत्य में बारिश का स्वागत किया जाता है। इसलिए इस नृत्य में हाथ के इशारे और पैरों की थिरकन भी इसी तरह की होती है। ढोलक और मंजीरे की थाप पर महिलाएं एक साथ एक ताल में कजरी करती हैं।