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    सावन की फुहार और कजरी की तान- काले बादलों और झूलों के बीच क्यों गाया जाता है बिहार का ये खास लोकगीत

    Updated: Mon, 08 Jun 2026 02:24 PM (IST)

    सावन के स्वागत के लिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कजरी गाई जाती है। यह लोकगीत बिहार की संस्कृति में रचा-बसा हुआ है। ...और पढ़ें

    क्यों गाई जाती है कजरी? (AI Generated Image)

    क्यों गाई जाती है कजरी? (AI Generated Image)

    HighLights

    1. कजरी सावन में गाया जाने वाला लोकगीत है

    2. यह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाया जाता है

    3. महिलाएं साथ मिलकर इस लोकगीत को गाती हैं

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की लोक संस्कृति इतनी समृद्ध है कि यहां बच्चे के जन्म, शादी, त्योहार और यहां तक कि हर मौसम के लिए खास लोकगीत बने हैं। जैसे चैत्र महीने में चैती गाते हैं, इसी तरह जब तपती गर्मी के बाद जब आसमान में काले बादल घिर आते हैं और सावन की पहली फुहार धरती को भिगोती है, तब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश गांवों में कजरी की तान गूंजती है।

    कजरी सिर्फ एक लोकगीत नहीं है, बल्कि महिलाओं के उल्लास, सावन की खूबसूरती और गांव में बसी प्राकृतिक सुंदरता की कहानी है। सावन और भादो के महीने में जब बारिश की फुहार धरती को भिगोती है, तब महिलाएं और लड़कियां झूला झूलती है और कजरी गीत गाकर सावन का स्वागत करती हैं। 

    कैसे हुई कजरी की शुरुआत?

    कजरी हिंदी के शब्द कजली या काजल से बना है। माना जाता है कि इसका सीधा संबंध काले-काले बादलों से हैं। ऐतिहासिक रूप से कजरी को उप-शास्त्रीय संगीत का भी हिस्सा माना गया है, लेकिन इसकी असली आत्मा लोकगीतों में बसती है। 

    माना जाता है कि इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर क्षेत्र से हुई थी और वहां से यह बनारस, भोजपुर और मिथिलांचल तक पहुंची। आज यह बिहार की संस्कृति में ऐसे रच-बस गई है कि कजरी गाए बिना सावन अधूरा लगता है। 

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    Kajri (2)

    (AI Generated Image)

    बिहार की संस्कृति में कजरी का महत्व

    कजरी मुख्य रूप से महिलाएं गाती हैं। महिलाओं का समूह एक साथ मिलकर कजरी गाकर सावन का स्वागत करती हैं। तपती गर्मी के बाद जब बारिश की बूंदें गिरती हैं, तो लोगों की खुशी बयां करने के लिए कजरी गाई जाती है। महिलाएं खेतों में धान रोपते हुए हुए साथ मिलकर कजरी गाती हैं और सावन का स्वागत करती हैं।

    कजरी को विरह की व्यथा बताने के लिए भी गाया जाता है। पुराने समय में पुरुष रोजगार के सिलसिले में परदेस चले जाते थे। तब सावन के सुहाने मौसम में पति से दूरी की व्यथा महिलाएं कजरी गाकर बयां करती थीं। सावन के महीने में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में झूला झूलने की भी परंपरा है। महिलाएं सावन में झूला झूलती हैं और साथ मिलकर कजरी गाती हैं। 

    कजरी का धार्मिक महत्व

    कजरी का धार्मिक आधार भी है। इसे देवी विंध्यवासिनी के गुणगान और राधा-कृष्ण की लीलाओं से जोड़कर भी गाया जाता है। साथ ही, जैसे चैती में हो रामा की टेक आती है, वैसे ही कजरी में रे हरी की तान गूंजती है। 

    रिमझिम बरसे पनिया, झूले राधा रनिया रे हरी…

    बिहार की सांस्कृतिक विरासत

    कजरी बिहार की लोकसंस्कृति में ऐसे रच-बस चुकी है कि इसके बिना सावन अधूरा लगता है। सदियों से कजरी गाने की यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आई है। दादी-नानी से मां सीखती हैं और उनसे उनकी बेटी। ऐसे ही मौखिक रूप से कजरी पीढ़ियों का सफर तय करती है।