विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

200 साल पुरानी टीस: जब पतियों को जबरन रंगून भेजा गया, तब बनारस की गलियों से निकला था ये लोकगीत

Published: Sun, 24 May 2026 02:24 PM (IST)Updated: Wed, 27 May 2026 05:48 PM (IST)

कोक स्टूडियो भारत ने अपने नए सीजन में कचौड़ी गली गाना रिलीज किया। इस गाने का इतिहास इंडो-बर्मी युद्ध से जुड़ा है।

क्या है कचौड़ी गली गाने का इतिहास? (AI Generated Image)

क्या है कचौड़ी गली गाने का इतिहास? (AI Generated Image)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इतिहास सिर्फ पन्नों पर नहीं लिखा जाता, वह लोकगीतों की धुनों में भी सांस लेता है। जिन दर्द भरी दास्तानों को वक्त की धूल और बड़ी-बड़ी किताबों ने भुला दिया, वे अक्सर किसी पुराने गीत के जरिए सदियों का सफर तय कर लेती हैं।

आजकल ऐसा ही एक 200 साल पुराना, अनकहा दर्द धुनों में ढलकर हमारी प्लेलिस्ट का हिस्सा बन गया है। 'कोक स्टूडियो भारत' के नए सीजन का पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत 'कचौड़ी गली' इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब सुना जा रहा है।

बनारस का यह कजरी लोकगीत सिर्फ एक वायरल गाना नहीं है, बल्कि यह 1824 के समय से जुड़ा है। इस गीत के बोल में एक पत्नी या प्रेमिका के विरह की टीस छिपी है, जो उनके एंग्लो-बर्मी युद्ध का जख्म को बयां करता है। आइए जानें क्या है कचौड़ी गली गाने की कहानी। 

क्या है बनारस की कचौड़ी गली का इतिहास?

यह कहानी साल 1824 के आस-पास की है, जब अंग्रेजों और बर्मा के साम्राज्य के बीच प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध छिड़ गया था। उस समय अंग्रेजों ने युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के कई इलाकों से आम नागरिकों, मजदूरों और पुरुषों को जबरदस्ती सेना में भर्ती करना शुरू कर दिया था।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, मिर्जापुर और बनारस के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में पुरुषों को पकड़कर समुद्र के रास्ते रंगून यानी आज के यांगून, म्यांमार भेज दिया गया। वे लोग एक ऐसे युद्ध का हिस्सा बनने के लिए मजबूर किए गए थे, जिसे उन्होंने कभी चुना ही नहीं था।

Kachori Gali  (1)

(AI Generated Image)

एक बेबस पत्नी की नजर से युद्ध का दर्द

'कचौड़ी गली' मूल रूप से बनारस की तंग गलियों की मिट्टी से उपजी एक ऐसी पत्नी की कहानी है, जिसका पति अंग्रेजों के इस क्रूर फैसले का शिकार हो जाता है। वह बनारस की कचौड़ी गली में बेबस खड़ी होकर अपने पति को ब्रिटिश सैनिकों के साथ जबरदस्ती जाते हुए देखती है।

यह गीत उस महिला के अंदर चल रहे दुख, गुस्से और अचानक से खाली हो गए घर के बोझ को बयां करता है। उस दौर में रंगून गए हजारों आम पुरुष कभी लौटकर वापस नहीं आए और जो लौटे वे खुद को उसी युद्ध में खोकर आए थे। इस युद्ध के बाद पीछे रह गई, तो सिर्फ उनकी पत्नियों की कभी न खत्म होने वाली टीस, विरह और सूनी गलियां।

तवायफों की महफिलें और प्रतिरोध की आवाज

इस पारंपरिक पूर्वी ठुमरी, दादरा और कजरी को जिंदा रखने में बनारस की संगीत परंपरा और वहां की तवायफों का बहुत बड़ा योगदान रहा। कहा जाता है कि जब भी इन महफिलों में किसी तवायफ के प्रेमी को अंग्रेज जबरन उठाकर रंगून ले जाते, तो यह गीत उनके सच्चे प्रेम और अंग्रेजों के खिलाफ एक विद्रोह की आवाज बन जाता था। बाद के दिनों में भारत की दिग्गज शास्त्रीय और लोक गायिकाओं ने इस गीत को घर-घर तक पहुंचाया और इसे इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। 


देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।