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    डिजिटल दुनिया की चकाचौंध में कहीं खो न जाए आपका बच्चा, हर टीनएजर के लिए मस्ट रीड हैं ये बुक्स

    Updated: Sun, 05 Apr 2026 02:05 PM (IST)

    किताबें न सिर्फ सिखाती हैं, बल्कि कई बार दबी आवाजों को सामने लाती हैं। टीनएजर्स की साथी बन रही कुछ ऐसी ही किताबों पर चर्चा... ...और पढ़ें

    नई पीढ़ी की कशमकश और डिजिटल वैलिडेशन का शोर (Image Source: AI-Generated)

    नई पीढ़ी की कशमकश और डिजिटल वैलिडेशन का शोर (Image Source: AI-Generated) 

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    आरती तिवारी, नई दिल्ली। वैष्णवी के साथ अक्सर होता है कि सही होने के बावजूद वह जब भी मम्मी को कुछ समझाने की कोशिश करती है, बात बिगड़ ही जाती है। लाख कोशिशों के बाद भी वह मम्मी के नजरिए को समझ नहीं पाती, लेकिन एक कड़ी है जो उन दोनों को जोड़ती है- किताबें। कितनी ही बार हुआ कि वैष्णवी ने कुछ बातें अपनी पढ़ी हुई किताबों के अंदाज में कहीं, जो मम्मी को समझ भी आ गईं। वाकई नए दौर की किताबें अब मम्मी-पापा से अपनी बात कहने, उम्र और समय के साथ हो रहे बदलावों से जुड़ी बातें समझने और समझाने के काम आ रही हैं। वे, जो इस बार छुट्टियों में बहुत काम आने वाली हैं।

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    (Image Source: AI-Generated) 

    कहानी जो प्रेरणा दे

    जीवन की कठिनाइयों को पार करने का हौसला कई बार सिखा जाती हैं किताबें। ऐसी ही किताब है देबस्मिता दासगुप्ता की ‘फैजा इज ए फाइटर’। लर्नर पब्लिशिंग ग्रुप द्वारा प्रकाशित उत्तर भारत की पृष्ठभूमि पर आधारित इस ग्राफिक नावेल में फैजा की कहानी है, जो आंतरिक और बाहरी संघर्षों से निपटने के लिए मुक्केबाजी का सहारा लेती है। यह किताब अपनी पहचान बनाने, मानसिक दृढ़ता विकसित करने और पाबंदियों भरे माहौल में अपना रास्ता खुद खोजने के जज्बे को खूबसूरती से दर्शाती है। वहीं वाणी प्रकाशन द्वारा संपादित मार्जान सतरापी का ग्राफिक नावेल 'पर्सेपोलिस' विश्व के सबसे चर्चित और प्रभावशाली ग्राफिक उपन्यासों में से एक है। ईरान के इस्लामी क्रांति के दौर की कहानी बताता यह उपन्यास सिर्फ कामिक बुक नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और जनतंत्र की खूबसूरत चित्रकथा है।

    टैबू नहीं यह कोई

    आमतौर पर किशोरावस्था और शारीरिक बदलावों पर चर्चा केवल लड़कियों तक सीमित रहती है, लेकिन लड़कों के लिए भी यह दौर उलझनों भरा होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए मेंस्ट्रूपीडिया की 'गुलु' सीरीज ग्राफिक गाइड भारतीय परिवेश के अनुसार लड़कों में होने वाले शारीरिक बदलावों, बुलिंग, सहमति (कंसेंट) और भावनाओं के प्रबंधन जैसे विषयों पर बात करती है।

    इसी तरह वर्ष 2026 में शिक्षा मंत्रालय, एनसीईआरटी और यूनेस्को ने मिलकर 'चलो आगे चलें' कामिक सीरीज लांच की है। यह किशोरों को स्वास्थ्य, स्वच्छता और लैंगिक समानता जैसे गंभीर विषय सरल तरीके से समझाती है।

    नई पीढ़ी की कहानी

    आज किशोरों के सामने एक तरफ घर की उम्मीदें हैं, तो दूसरी तरफ डिजिटल दुनिया की चकाचौंध। पूजा मारवाह की किताब ‘बीइंग एन इंडियन टीनएजर’ इसी कशमकश को बयां करती है। वेस्टलैंड बुक्स द्वारा प्रकाशित यह किताब मुख्यत: इंटरनेट मीडिया और वैलिडेशन का शोर, माता-पिता व बच्चों के बीच बढ़ती दूरी और 16 साल की उम्र तक पूरी जिंदगी का खाका तैयार कर लेने के बोझ बड़े रोचक अंदाज से बताती है। इसी तरह हार्परएली द्वारा प्रकाशित 'फिटिंग इंडियन' (ज्योति चंद) ग्राफिक उपन्यास पारंपरिक संस्कारों और आधुनिक पहचान के बीच झूलते किशोरों की मानसिक स्थिति और संघर्ष को खूबसूरती से पेश करता है। वेस्टलैंड बुक्स द्वारा कृत ‘लव का रीबूट’ (दिव्या मित्तल) कालेज जीवन की दोस्ती, प्यार, दिल टूटने और रिश्तों में होने वाले मैनिपुलेशन जैसे वास्तविक अनुभवों पर आधारित है। वहीं दिव्या आनंद की बाडी पाजिटिविटी पर केंद्रित किताब 'अगल्या इन द स्पाटलाइट' ऐसी बच्ची की कहानी है जो गंजेपन के कारण स्कूल में बुलिंग का शिकार होती है। पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया की यह किताब सिखाती है कि अपनी कमियों को स्वीकार करना ही असली ताकत है। 16 लेखकों के संग्रह वाली किताब ‘हग योरसेल्फ’ रंग और शारीरिक बनावट जैसे खूबसूरती के तय मानकों को चुनौती देती है। लेखक अंकुर वारिकू अपनी किताब 'बियांड द सिलेबस' के माध्यम से टीनएजर्स को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर आत्मविश्वास, वित्तीय साक्षरता और रिश्तों को सुलझाने जैसे जीवन के जरूरी कौशल सिखा रहे हैं। वहीं, पफिन बुक्स की 'अ गर्ल, अ टाइगर एंड अ वेरी स्ट्रेंज स्टोरी' साहस और मित्रता की मर्मस्पर्शी गाथा है, जो इंसान और प्रकृति के अनूठे रिश्ते के साथ-साथ कठिन परिस्थितियों में आशावादी बने रहने की प्रेरणा देती है।

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    इंटरनेट मीडिया भी बना विषय

    आज की जीवनशैली स्मार्टफोन के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने जिंदगी के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। कैलाश मांजू बिश्नोई की किताब 'इंस्टाग्राम वाला लव' दिखाती है कि कैसे आधुनिक प्रेम 'रील' और 'रियल' लाइफ के बीच उलझ गया है। मंजुल प्रकाशन की इस किताब में धोखा, गलतफहमी और 'गोस्टिंग' जैसे गंभीर विषयों को नई पीढ़ी के ही अंदाज में समझाया गया है। इसी क्रम में ब्लूम्सबरी पब्लिशर्स की किताब 'सोशल मीडिया: सबसे डेंजरस थर्ड पर्सन' नई पीढ़ी को आईना दिखाती है कि कैसे आभासी दुनिया हमारे वास्तविक रिश्तों को खोखला कर रही है। स्क्रीन में खोए बच्चों और किशोरों के लिए प्रज्ञा मिश्रा की शृंखला 'गीगी जारा' और इसका अगला भाग 'गीगी जारा 2.0' ताजा हवा के झोंके की तरह है। कल्पनाशीलता, ईमानदारी और टीम वर्क जैसे गुणों की समझ और तनाव से मुक्ति देती अनबाउंड स्क्रिप्ट द्वारा प्रकाशित इन दोनों किताबों में रोमांच भी है और समझदारी भी।

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