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    'हम साथ-साथ हैं' से 'हम अकेले ही सही': भारत में क्यों तेजी से टूट रहे हैं संयुक्त परिवार?

    Updated: Fri, 22 May 2026 10:01 AM (IST)

    भारत में पिछले दो दशकों में संयुक्त परिवारों की परंपरा तेजी से बदल रही है, जहां एकल परिवारों की संख्या में 20% की वृद्धि हुई है। ...और पढ़ें

    भारत में तेजी से बदल रही है परिवारों की तस्वीर (Image Source: AI-Generated)

    भारत में तेजी से बदल रही है परिवारों की तस्वीर (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में हमेशा से बड़े और संयुक्त परिवारों की परंपरा रही है, जहां घर आंगन लोगों की चहल-पहल से भरा रहता था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब यह तस्वीर बहुत तेजी से बदल रही है? पिछले दो दशकों में भारत में 'एकल परिवारों' (न्यूक्लियर फैमिली) की संख्या में 20% का बड़ा उछाल आया है। अब लोग संयुक्त परिवारों से निकलकर छोटे परिवारों में रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। आइए, हालिया आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि भारतीय परिवारों का यह ढांचा कैसे और कितना बदल रहा है।

    joint family system

    (Image Source: AI-Generated) 

    गांव हो या शहर, हर जगह बढ़ रहे हैं छोटे परिवार

    नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के आंकड़े बताते हैं कि आज देश में 58.2% परिवार एकल हो चुके हैं। अगर आपको लगता है कि संयुक्त परिवारों के टूटने का सिलसिला सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित है, तो यह सच नहीं है।

    आंकड़ों के मुताबिक, शहरों में जहां 61.7% परिवार एकल हैं, वहीं गांवों में भी यह आंकड़ा 56% तक पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि अब गांवों में भी संयुक्त परिवारों का पुराना ढांचा दरकने लगा है। सर्वेक्षण कंपनी 'कैंटर' की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2008 में देश में सिर्फ 37% परिवार ही एकल थे, लेकिन पिछले दो दशकों के भीतर ही इनमें 20% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

    सिकुड़ रहा है परिवारों का आकार

    एकल परिवारों के इस बढ़ते चलन के बीच घर के सदस्यों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। भारत में अब एक परिवार का औसत आकार घटकर सिर्फ 4.4 सदस्य ही रह गया है। गांवों में यह औसत (4.5) शहरों (4.2) के मुकाबले मामूली रूप से ही ज्यादा है।

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    NFHS की रिपोर्ट के अनुसार:

    • देश में सिर्फ 23% परिवार ऐसे बचे हैं जिनमें 4 सदस्य हैं।
    • 16.7% परिवारों में सदस्यों की संख्या केवल 3 रह गई है।

    सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अब 4.8% लोग घरों में बिल्कुल अकेले जीवन बिता रहे हैं।

    कमाई पर किसका हक?

    इस बदलाव का एक बेहद दिलचस्प पहलू कामकाजी महिलाओं की वित्तीय आजादी से जुड़ा है। आमतौर पर माना जाता है कि एकल परिवार में महिलाएं ज्यादा आजाद होती हैं, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।

    • आर्थिक आजादी: संयुक्त परिवारों में रहने वाली 24.5% कामकाजी महिलाओं का अपनी कमाई पर पूरी तरह से स्वतंत्र नियंत्रण होता है, जबकि एकल परिवारों में यह आंकड़ा सिर्फ 20% ही है।
    • पति का दखल: 16% एकल परिवारों में पत्नी की कमाई को कहां और कैसे खर्च करना है, इसका फैसला उनके पति करते हैं। वहीं, संयुक्त परिवारों में ऐसा सिर्फ 14.3% मामलों में ही देखा गया है।
    • महिला मुखिया: देश के 17.5% परिवार ऐसे हैं, जिनकी मुखिया आज महिलाएं हैं। दिलचस्प बात यह है कि शहरी क्षेत्रों (17.1%) के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों (17.6%) में महिला मुखिया वाले परिवार थोड़े ज्यादा हैं।

    मोबाइल बढ़ा रहा है दूरियां, माता-पिता हो रहे चिड़चिड़े

    परिवारों के इस बदलते ताने-बाने के बीच मोबाइल फोन भी रिश्तों में एक दीवार बन रहा है। वीवो की एक रिसर्च के मुताबिक, 95% माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं।

    लेकिन, इस रिपोर्ट का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला है। 74% माता-पिता खुद यह बात स्वीकार करते हैं कि जब वे अपने मोबाइल फोन का उपयोग कर रहे होते हैं और उसी वक्त अगर बच्चे उनसे कुछ पूछ लें, तो वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और बच्चों की बातों का ठीक से जवाब नहीं देते।

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