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    सेफ्टी के नाम पर लोकेशन ट्रैक करना बनी पेरेंट्स की बड़ी भूल, बच्चे फैसले लेने की जगह बन रहे हैं डरपोक

    Updated: Fri, 03 Jul 2026 04:00 PM (IST)

    निगरानी के चक्कर में पेरेंट्स बच्चों की प्राइवसी और सेफ्टी के बीच फर्क करना भूल जाते हैं। ...और पढ़ें

    डिजिटल निगरानी बना पेरेंट्स और युवाओं के लिए परेशानी (Image Source: AI Generated)

    डिजिटल निगरानी बना पेरेंट्स और युवाओं के लिए परेशानी (Image Source: AI Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। डिजिटल दौर ने जहां पेरेंट्स को यह सुविधा दी है कि वो अपने बच्चों की लोकेशन के बारे में जान सकें तो वहीं निगरानी के चलते पेरेंट्स बच्चों की प्राइवसी और सेफ्टी के बीच फर्क करना भूल जाते हैं। इससे न केवल पेरेंट्स की बेचैनी बढ़ रही है, बल्कि बच्चे भी फैसले लेने और जोखिम उठाने से डरने लगे हैं। ऐसा हम नहीं बल्कि हाल ही में किया गया एक सर्वे कह रहा है, जिसपर बात किया जाना बेहद जरुरी है। 

    डिजिटल निगरानी बना पेरेंट्स और युवाओं के लिए परेशानी  

    यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ सीएस मॉट चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ने हाल ही में एक सर्वे किया। इस सर्वे में यह बात निकलकर सामने आई कि अमेरिका और यूरोप समेत बहुत से देशों में पेरेंट्स सेफ्टी के लिए अपने एडल्ट बच्चों की निगरानी कर रहे हैं। पेरेंट्स का ऐसा किया जाना भले ही ऊपर से सुकून देने वाला हो सकता है, लेकिन अंदर-अंदर यह उनकी बेचैनी बढ़ाने का काम कर रहा है। वहीं, ये यंग एडल्ट भी इतनी निगरानी में फैसले लेने या कोई जोखिम लेने से डर रहे हैं। 

    18-25 साल के एडल्ट पर पेरेंट्स रख रहे डिजिटली नजर

    यह रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में करीब 52% पेरेंट्स यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे 18-25 साल के अपने एडल्ट बच्चों की मोबाइल या एप से लोकेशन ट्रैक कर रहे हैं। इनमें में लड़कों की तुलना में लड़कियों को ज्यादा ट्रैक किया जा रहा है। सर्वे में पेरेंट्स की यह आदत चिंताजनक बताई गई है क्योंकि इससे माता-पिता बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी में दखल देने लगते हैं। इतना ही नहीं, यह निगरानी इस कदर बढ़ गई है कि पेरेंट्स उनकी पढ़ाई, क्लास या डॉक्टर से अपॉइन्टमेंट जैसी जरूरी चीजों पर भी सवाल करने लगते हैं। 

    पेरेंट्स में बढ़ रहा है तनाव 

    बच्चों की लगातार निगरानी से पेरेंट्स को सुकून मिलने के बजाय उनमें तनाव बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट में पाया गया है कि 23% पेरेंट्स ने माना कि हर दिन लोकेशन ट्रैक करने से उनमें बेचैनी बढ़ रही है। बताते चलें कि इनमें से 68% माता-पिता का कहना है कि वो ऐसा अपने पीस ऑफ माइंड के लिए करते हैं, जबकि 64% एमर्जेंसी के लिए ऐसा कर रहे हैं। इसके अलावा, 17% पेरेंट्स का मानना है कि वो जानना चाहते हैं कि उनका बच्चा कहां है।

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    Source:  C.S. Mott Children's Hospital Survey