अमृतसर का वो मंदिर, जिसे पहली नजर में Golden Temple समझ बैठते हैं लोग; रामायण काल से जुड़ा है इतिहास
क्या आप जानते हैं कि अमृतसर में एक ऐसा भव्य मंदिर मौजूद है, जिसकी वास्तुकला किसी को भी अचंभित कर सकती है? ...और पढ़ें

अमृतसर जाएं तो जरूर करें दुर्गियाना मंदिर के दर्शन (Image Source: AI-Generated)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अमृतसर शहर का नाम सुनते ही आपके जेहन में सबसे पहले 'स्वर्ण मंदिर' की तस्वीर उभरती होगी, लेकिन क्या आपको मालूम है कि इसी शहर में मां दुर्गा को समर्पित एक ऐसा भव्य मंदिर भी है, जिसकी वास्तुकला हूबहू स्वर्ण मंदिर की तरह है?
जी हां, पहली नजर में आप शायद दोनों के बीच का अंतर ही न समझ पाएं। आइए, इस अद्भुत स्थान के इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और इसकी बेमिसाल वास्तुकला की खासियतों पर नजर डालते हैं।

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स्थानीय लोग कहते हैं 'शीतला मंदिर'
स्थानीय लोग इस पवित्र स्थल को 'शीतला मंदिर' के नाम से भी पुकारते हैं। इसका मूल इतिहास 16वीं सदी का बताया जाता है। हालांकि, आज हम इसकी जो भव्य इमारत देखते हैं, उसका निर्माण 1921 में किया गया था। इस मंदिर को गुरु रामदास जी और पृथ्वी चंद जी के वंशज, गुरु हरसहाय मल कपूर के विजन और देखरेख में नया रूप दिया गया था।
अद्भुत वास्तुकला खींचती है सबका ध्यान
वास्तुकला के लिहाज से यह मंदिर किसी अजूबे से कम नहीं है। मुख्य भवन के ऊपर बने गुंबदों को सोने की आकर्षक नक्काशी से सजाया गया है, जिसकी चमक दूर से ही ध्यान खींच लेती है। यह मंदिर 160x130 मीटर आकार वाले एक बेहद शांत और पवित्र सरोवर के ठीक बीच में खड़ा है। मुख्य गर्भगृह तक जाने के लिए आपको एक सुंदर पुल से होकर गुजरना होता है, जो बिल्कुल स्वर्ण मंदिर के दर्शन जैसी अनुभूति देता है।
चांदी के विशाल दरवाजे से होता है स्वागत
जैसे ही आप मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं, 'दर्शनी ड्योढ़ी' आपका स्वागत करती है। यह 12 बाय 12 फीट का एक विशाल दरवाजा है, जिसे पूरी तरह चांदी से बनाया गया है। मंदिर के अंदर कदम रखते ही एक दिव्य आभा और शांति का अहसास होता है। इसके मुख्य गर्भगृह में श्री लक्ष्मी-नारायण जी की खड़ी अवस्था में मूर्ति विराजमान है। इसके साथ ही, आपको यहां श्री राम दरबार, श्री राधा-कृष्ण और श्री गिरिराज महाराज के अत्यंत मनमोहक स्वरूपों के दर्शन भी होते हैं।
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रामायण काल से जुड़ी हैं मंदिर की पौराणिक कथाएं
दुर्गियाना मंदिर का प्रांगण पौराणिक दृष्टि से भी बेहद खास है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने अपने अश्वमेध यज्ञ के दौरान इस पवित्र भूमि पर कदम रखा था। मंदिर के अहाते में आज भी वह पेड़ मौजूद है, जहां लव और कुश ने भगवान राम के उस यज्ञ के घोड़े को पकड़कर बांधा था। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि सूर्य देव के पोते, राजा इक्ष्वाकु ने इसी स्थान पर कई धार्मिक अनुष्ठान और यज्ञ संपन्न किए थे।
त्योहारों पर दिखती है गजब की रौनक
अगर आप यहां आने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो जान लें कि यह मंदिर भक्तों के लिए सुबह 06:00 बजे से लेकर रात 10:00 बजे तक खुला रहता है। वैसे तो यहां हर दिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन दीवाली, दशहरा, नवरात्रि, होली, राम नवमी और जन्माष्टमी जैसे विशेष त्योहारों पर इस मंदिर की सजावट और रौनक देखने लायक होती है।
आसपास की जगहें और शॉपिंग का मजा
दुर्गियाना मंदिर से स्वर्ण मंदिर पहुंचने में बस कुछ ही मिनटों का समय लगता है। जलियांवाला बाग और पार्टिशन म्यूजियम जैसी ऐतिहासिक जगहें भी इसके आसपास ही मौजूद हैं। दर्शन करने के बाद आप मंदिर के बाहर मौजूद स्थानीय बाजार का रुख कर सकते हैं। आप यहां से धार्मिक चीजें, स्थानीय हस्तशिल्प का सामान और खूबसूरत पारंपरिक कपड़ों की भी खरीदारी कर सकते हैं।
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