Basant Panchami 2026: उत्तराखंड की पहाड़ी से दक्षिण के तट तक, बेहद खास हैं मां सरस्वती के 5 प्राचीन मंदिर
वसंत पंचमी का पावन त्योहार आते ही हर तरफ विद्या और ज्ञान की देवी, मां सरस्वती की आराधना का उत्साह छा जाता है। वैसे तो हम सभी इस शुभ दिन पर अपने घरों म ...और पढ़ें

Basant Panchami 2026: भारत के 5 प्राचीन सरस्वती मंदिर (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। वसंत पंचमी का पावन पर्व विद्या और कला की देवी मां सरस्वती को समर्पित है। इस दिन देश भर में लोग अपने घरों और मंदिरों में सरस्वती पूजा करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में मां सरस्वती के कुछ ऐसे प्राचीन और भव्य मंदिर भी हैं, जहां आप न केवल वसंत पंचमी पर, बल्कि साल भर कभी भी दर्शन के लिए जा सकते हैं? आइए, आज हम आपको भारत के विभिन्न कोनों में स्थित मां सरस्वती के 5 ऐतिहासिक मंदिरों (Goddess Saraswati Temples India) से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हैं।
सावित्री देवी मंदिर, पुष्कर (राजस्थान)

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राजस्थान के पुष्कर में रत्नागिरी पहाड़ी की चोटी पर स्थित सावित्री देवी मंदिर देश के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। लगभग 750 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर भगवान ब्रह्मा की पत्नियों- सावित्री और गायत्री को समर्पित है।
इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 970 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यहां से पुष्कर झील का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। इस मंदिर के अंदर तीन मूर्तियां विराजमान हैं- बीच में देवी सावित्री, दाईं ओर देवी शारदा और बाईं ओर देवी सरस्वती।
सरस्वती मंदिर, राजस्थान (शारदा पीठ)

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सफेद संगमरमर से बना यह शानदार मंदिर 1959 में बनाया गया था। यह 20वीं सदी की वास्तुकला और इंडो-आर्यन नागर शैली का एक बेहतरीन उदाहरण है। मकराना मार्बल से बना यह मंदिर 70 खंभों पर टिका है और इसका क्षेत्रफल लगभग 25,000 वर्ग फीट है।
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इस मंदिर का शिखर 110 फीट ऊंचा है, जिस पर सोने की परत चढ़े तांबे के कलश लगे हैं। इसकी बनावट कुछ ऐसी है कि यह बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (BITS) के क्लॉक टॉवर की सीध में है, जहां ज्ञान की देवी और श्री जी.डी. बिड़ला की प्रतिमा एक दूसरे के आमने-सामने नजर आती हैं।
माता सरस्वती मंदिर, उत्तराखंड

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बद्रीनाथ से केवल 3 किलोमीटर दूर, माणा गांव के पास स्थित यह मंदिर वेदों और शास्त्रों में विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि यह स्थान देवी सरस्वती का जन्मस्थान है। यहां सरस्वती नदी एक धारा के रूप में प्रकट होती है, जिसे 'कलकल' धारा कहा जाता है।
कहा जाता है कि यह धारा एक मुख के समान दिखाई देती है, जो देवी के दिव्य मूल का प्रतीक है। किंवदंतियों के अनुसार, इसी स्थान पर महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी और पांडवों ने अपनी स्वर्ग यात्रा के दौरान यहां का दौरा किया था। यहां पास में ही भीम शिला नामक एक अनोखी चट्टान भी मौजूद है।
कूथनूर महा सरस्वती मंदिर, तमिलनाडु

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तमिलनाडु का कूथनूर मंदिर, जिसे पहले अंबलपुरी के नाम से जाना जाता था, मां सरस्वती को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। लोक कथाओं के अनुसार, भगवान ब्रह्मा और सरस्वती के बीच एक विवाद के कारण उन्हें पृथ्वी पर भाई-बहन के रूप में जन्म लेना पड़ा था। बाद में भगवान शिव ने सरस्वती को गंगा नदी में मिला दिया, जो अब यहां अरसलार नदी के रूप में बहती है।
राजा राज चोल ने यह भूमि कवि ओट्टक्कूथन को दान में दी थी, जिसके बाद इस गांव का नाम कूथनूर पड़ा। यहां देवी दुर्गा को गांव की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।
श्री शारदाम्बा मंदिर, कर्नाटक

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कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित इस प्राचीन मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने की थी। शुरुआत में यहां चंदन की लकड़ी से बनी शारदाम्बा (सरस्वती) की एक खड़ी प्रतिमा थी।
बाद में, 14वीं शताब्दी के दौरान विजयनगर के शासकों और 12वें जगद्गुरु श्री विद्यारण्य ने लकड़ी की मूर्ति की जगह सोने की बैठी हुई प्रतिमा स्थापित की। यह मंदिर दक्षिण भारत में विद्या की देवी का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।