कभी लूट के इनाम में मिली थी आज की सबसे क्लीन सिटी 'इंदौर', पढ़ें समय के साथ कैसे बदली इस शहर की किस्मत
मध्य प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में बसा इंदौर आज भले ही देश के सबसे बड़े कमर्शियल हब के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसका इतिहास बेहद पुराना और दिलचस्प ह ...और पढ़ें

मल्हार राव होलकर को इनाम में मिला था इंदौर! (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज जब हम 'इंदौर' का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों, चकाचौंध भरे बाजारों और मध्य प्रदेश के सबसे बड़े बिजनेस हब की तस्वीर उभरती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आधुनिकता के पीछे सत्ता की एक बेहद रोमांचक कहानी छिपी है?
जी हां, पश्चिमी मध्य प्रदेश में बसा यह शहर सिर्फ आज का ही कमर्शियल हब नहीं है, बल्कि सदियों पुराने जमाने से ही यह व्यापार का एक अहम केंद्र रहा है। आइए, डिटेल में जानते हैं इस बारे में।
कहानी जमींदारों की, जिन्होंने बसाया था इंदौर
क्या आप जानते हैं कि इंदौर को बसाने वालों के पूर्वज असल में मालवा के पुश्तैनी जमींदार हुआ करते थे? इन जमींदारों की जिंदगी किसी राजा-महाराजा से कम नहीं थी। जब इस इलाके में होलकर वंश का राज आया, तब भी इन जमींदारों का शाही रुतबा कम नहीं हुआ।
उनके पास अपने हाथी, निशान, डंका और गद्दी जैसे राजशाही प्रतीक बरकरार रहे। यहां तक कि दशहरे के मौके पर सबसे पहली पूजा करने का हक भी इन्हीं के पास था। औरंगजेब, आलमगीर और फर्रुखसियर जैसे मुगल बादशाहों ने भी इन्हें जागीरदार के रूप में मान्यता दी थी।

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लूट के इनाम में मिला इंदौर
इंदौर के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव साल 1733 में आया। मालवा फतह करने के बाद मराठा संघ के एक प्रमुख चेहरे, मल्हार राव होलकर को लूट के हिस्से के रूप में इंदौर मिला। इसके बाद मराठा साम्राज्य के भीतर ही सत्ता की जंग छिड़ गई, जिसमें होलकर वंश का सिंधिया और पेशवाओं के साथ लंबा और भीषण संघर्ष चला।
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होलकर वंश का पतन और अंग्रेजों का दखल
ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद इंदौर की कहानी ने फिर करवट ली। 1803 में होलकर शासकों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया। लेकिन 1817-1818 के तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। इस हार के बाद होलकर वंश को अपना बहुत बड़ा इलाका अंग्रेजों को सौंपना पड़ा और उनका पुराना गौरव भी छिन गया।
अंग्रेज यहीं नहीं रुके, उन्होंने गद्दी के मामलों में भी दखल देना शुरू कर दिया, जिसके चलते दो उत्तराधिकारियों को रहस्यमयी तरीके से अपनी गद्दी तक छोड़नी पड़ी। यह दौर काफी चुनौतीपूर्ण था, जो 1947 में भारत की आजादी और इंदौर के भारत गणराज्य में शामिल होने तक चला।
कैसे पड़ा इंदौर का नाम?
क्या आपने कभी सोचा है कि मध्य प्रदेश की शान 'इंदौर' को उसका यह नाम आखिर कैसे मिला? बता दें, मालवा के पठार पर, समुद्र तल से 553 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस शहर की कहानी इसके भूगोल से गहराई से जुड़ी है।
इस खूबसूरत शहर के बीचों-बीच सरस्वती और खान नाम की दो छोटी नदियां बहती हैं। शहर के एकदम केंद्र में जहां इन दोनों नदियों का पावन संगम होता है, वहां 18वीं सदी का एक ऐतिहासिक 'संगमनाथ' या 'इंद्रेश्वर' मंदिर स्थित है। इसी संगम और मंदिर में शहर की असल पहचान छिपी है, क्योंकि हमारे आज के 'इंदौर' का नाम इसी प्राचीन इंद्रेश्वर देवता के नाम पर ही रखा गया है।

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सिर्फ शहर नहीं, एक भव्य विरासत है इंदौर
इंदौर का इतिहास सिर्फ पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज भी यहां की शानदार इमारतों में झलकता है:
राजवाड़ा
खजूरी बाजार के बीचों-बीच शान से खड़ा राजवाड़ा इंदौर की सबसे पुरानी और मशहूर इमारतों में से एक है। 1747 ई. में मल्हार राव होलकर द्वारा बनवाए गए इस सात मंजिला महल में मराठा वास्तुकला की झलक साफ दिखती है। यह 1880 ई. तक होलकर राजाओं का घर रहा। छतरियों के पास बने इस महल के सामने एक बहुत सुंदर गार्डन है, जहां रानी अहिल्या बाई की मूर्ति के साथ-साथ फव्वारे और एक आर्टिफिशियल झरना भी है।
लालबाग पैलेस
खान नदी के किनारे और शहर के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित यह तीन मंजिला महल भव्यता की जी-जागती मिसाल है। इसका निर्माण महाराजा शिवाजी राव होलकर ने 1886 से 1921 के बीच करवाया था।
महात्मा गांधी हॉल
इंदौर की सबसे खूबसूरत इमारतों में शुमार इस हॉल का निर्माण 1904 में हुआ था। इंडो-गॉथिक शैली और सिवनी के पत्थरों से बनी इस इमारत को पहले 'किंग एडवर्ड हॉल' कहा जाता था, लेकिन 1948 में इसका नाम बदल दिया गया। इसके सामने लगा चार चेहरों वाला बड़ा सा क्लॉक टावर और इसके गुंबद इसे बेहद खास बनाते हैं। यहां 2,000 लोग एक साथ आ सकते हैं। प्रदर्शनियों के अलावा इस परिसर में बच्चों का पार्क, एक लाइब्रेरी और एक मंदिर भी मौजूद है।
सेंट्रल म्यूजियम
यह म्यूजियम उन दिनों की याद दिलाता है जब होलकर राजाओं को अंग्रेजों के सामने झुकना पड़ा था और अपने क्षेत्र सौंपने पड़े थे। आज इस म्यूजियम में होलकर शासकों के हथियार और गोला-बारूद बहुत सहेज कर रखे गए हैं। इसके अलावा यहां परमार काल की लिपियां, प्राचीन सिक्के और कई दुर्लभ कलाकृतियां भी मौजूद हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं।
स्वच्छता में सबसे ऊपर है इंदौर का डंका
आज के इंदौर की बात करें, तो यह शहर सिर्फ अपने व्यापार या महलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी साफ-सफाई के लिए भी पूरी दुनिया में मशहूर है। अपने अतीत को सहेजने के साथ-साथ इंदौर ने आधुनिकता और नागरिक जिम्मेदारी में एक नई मिसाल कायम की है।
लगातार 8 सालों से 'भारत के सबसे स्वच्छ शहर' का ताज हासिल करते हुए इस शहर ने साबित कर दिया है कि वह अपने ऐतिहासिक गौरव को एक नई, साफ-सुथरी और प्रेरणादायक पहचान के साथ आगे ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
Source: Government of Madhya Pradesh
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