द्रविड़ वास्तुकला और भारतीय विरासत की बेजोड़ मिसाल है शोर मंदिर, 8वीं शताब्दी में हुआ था निर्माण
तमिलनाडु के महाबलीपुरम में स्थित शोर मंदिर, 8वीं शताब्दी में पल्लव शासक नरसिंहवर्मन द्वितीय द्वारा निर्मित एक प्राचीन द्रविड़ शैली ...और पढ़ें
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महाबलीपुरम में स्थित है 8वीं शताब्दी का शोर मंदिर (Picture Courtesy: Freepik)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के प्राचीन मंदिरों में शोर मंदिर का नाम एक अनोखी पहचान रखता है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय वास्तुकला कला, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का भी बेजोड़ उदाहरण है।
समुद्र के बेहद पास होने के कारण इसे लहरों से बचाने के लिए इसके आसपास एक बांध भी बनाया गया है, जो इसकी ऐतिहासिक अहमियत को और दर्शाता है। आइए आज हम इसी प्राचीन मंदिर से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातों के बारे में जानते हैं।

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पल्लव वंश की गौरवशाली विरासत
शोर मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी (लगभग 700–728 ईस्वी) के बीच पल्लव वंश के शासक नरसिंहवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था। उस समय पल्लव शासक द्रविड़ स्थापत्य कला शैली को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे थे। यही वजह है कि यह मंदिर उस दौर की वास्तुकला और धर्म का प्रतीक माना जाता है। उस समय महाबलीपुरम एक प्रमुख बंदरगाह नगर भी था, जहां से समुद्री व्यापार होता था और शोर मंदिर समुद्र के किनारे इस समृद्धि का साक्षी बना।
शिव और विष्णु का अनोखा संगम
धार्मिक दृष्टि से शोर मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर परिसर में दो शिवलिंग स्थापित हैं, जो इसकी शैव परंपरा को दर्शाते हैं। साथ ही, परिसर के एक हिस्से में भगवान विष्णु की अनंतशायी प्रतिमा भी मौजूद है। इस तरह यह मंदिर शैव और वैष्णव परंपराओं के मेल का उदाहरण प्रस्तुत करता है। समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यह मंदिर प्रकृति और ईश्वर के गहरे संबंध का प्रतीक भी माना जाता है।
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द्रविड़ शैली और नंदी की खास मौजूदगी
शोर मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है और यह पूरी तरह से द्रविड़ स्थापत्य शैली में बना हुआ है। ऊंचा शिखर, दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी और मंदिर के चारों ओर स्थापित नंदी की मूर्तियां इसकी सबसे बड़ी खासियत हैं। यही कारण है कि यह मंदिर सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि कला और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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सात पगोडा की रहस्यमयी कथा
शोर मंदिर से जुड़ी एक मशहूर पौराणिक मान्यता सात पगोडा की है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कभी सात भव्य मंदिर थे, जिनमें से छह समुद्र में समा गए और आज केवल शोर मंदिर ही दिखाई देता है। वर्ष 2004 की सुनामी के बाद समुद्र से कुछ प्राचीन संरचनाओं के अवशेष मिलने से इस कथा को और मजबूती मिली।
यूनेस्को की मान्यता और स्थापत्य कौशल
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वर्ष 1984 में महाबलीपुरम के स्मारक समूह में शोर मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। सदियों से समुद्री लहरों, हवा और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद इस मंदिर का आज भी सुरक्षित रहना तत्कालीन स्थापत्य कौशल की श्रेष्ठता को दर्शाता है। यही वजह है कि शोर मंदिर आज भी भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में गर्व से खड़ा है।
