AC कोच में यात्रियों को क्यों मिलती हैं 2 अलग-अलग चादरें? लॉजिक जानकर आप भी करेंगे रेलवे की तारीफ
हाल ही में, रेल मंत्रालय ने बताया कि ट्रेन के एसी कोच में मिलने वाली दो अलग-अलग चादरों का सही इस्तेमाल कैसे करना होता है। ...और पढ़ें

ट्रेन में मिली दोनों चादरों को एक जैसा समझते हैं? जानिए कौन-सी किस काम आती है (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय रेलवे के AC कोच का आरामदायक सफर और सीट पर पहुंचते ही मिलने वाला वह साफ-सुथरा बेडरोल... जी हां, यह हम सबकी रेल यात्रा का एक अहम हिस्सा होता है। इस बेडरोल किट में एक पिलो कवर, एक कंबल, एक तौलिया और दो चादरें होती हैं।
हालांकि, क्या सफर के दौरान कभी आपके दिमाग में यह सवाल आया है कि रेलवे आखिर एक यात्री को दो चादरें ही क्यों देता है? हम में से ज्यादातर लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से इनका इस्तेमाल कर लेते हैं। कोई दोनों चादरों को सीट पर बिछा लेता है, तो कोई एक को बिछाकर दूसरी को कंबल के नीचे लगाकर ओढ़ लेता है।
अगर आप भी अब तक ऐसा ही करते आए हैं, तो यह आर्टिकल आपको जरूर पढ़ना चाहिए। दरअसल, हाल ही में खुद रेल मंत्रालय ने संसद में इस 'बेडरोल मिस्ट्री' से पर्दा उठाया है। आइए जानते हैं कि आखिर इन दो चादरों को देने के पीछे रेलवे का असली मकसद क्या है और इनका सही इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए।

(Image Source: AI-Generated)
AC कोच में कैसे करें दोनों चादरों का सही इस्तेमाल?
रेल मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय रेलवे एसी क्लास में सफर करने वाले यात्रियों को हमेशा स्वच्छ और साफ बिस्तर मुहैया कराता है। हर बेडरोल किट में मिलने वाली दो चादरों का काम अलग-अलग होता है:
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- पहली चादर: यह चादर आपको अपनी स्लीपर सीट पर बिछाने के लिए दी जाती है।
- दूसरी चादर: इस एक्स्ट्रा चादर का इस्तेमाल आपको ओढ़ने वाले कंबल के ठीक नीचे करना होता है, ताकि कंबल और आपके शरीर के बीच एक हाइजीन बनी रहे।
क्यों जरूरी है ऐसा करना?
इसके पीछे सेहत और साफ-सफाई से जुड़ी एक बहुत अहम वजह है। दरअसल, ट्रेन में दिए जाने वाले ऊनी कंबल को हर यात्रा के बाद धोया नहीं जाता है। ऐसे में अगर आप सीधे कंबल ओढ़ते हैं, तो वह आपके शरीर के सीधे संपर्क में आता है। दूसरी चादर का मुख्य काम उसी कंबल को आपके शरीर से टच होने से रोकना है।
रेलवे इन चादरों को एक बार इस्तेमाल होने के बाद हमेशा धोता है। इसलिए अगली बार जब आप एसी कोच में सफर करें, तो हमेशा कंबल के नीचे दूसरी चादर लगाकर ही ओढ़ें।
अब आ रहे हैं 'कवर' वाले कंबल
यात्रियों के अनुभव को और बेहतर बनाने के लिए रेलवे ने एक नई पहल शुरू की है। अब यात्रियों को कंबल के साथ 'कंबल कवर' भी दिए जा रहे हैं। इससे यात्रियों को अलग से चादर लगाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।
फिलहाल यह नई सुविधा उत्तर पश्चिम रेलवे की कुछ ट्रेनों और कामाख्या से हावड़ा के बीच चलने वाली नई 'वंदे भारत स्लीपर ट्रेन' में दी जा रही है। रेलवे की इस पहल की यात्रियों द्वारा खूब तारीफ की जा रही है।
कितने दिनों में बदल दिए जाते हैं रेलवे के चादर और कंबल?
क्या आपको पता है कि रेलवे एक तय समय के बाद चादर, तौलिया और कंबल को पूरी तरह से रिप्लेस कर देता है? आइए जानते हैं इनका समय:
- तौलिया और तकिये का कवर: हर 9 महीने में।
- हैंडलूम लिनन: हर 12 महीने में।
- पॉलीवास्ट्रा (खादी और ग्रामोद्योग आयोग - KVIC द्वारा सप्लाई): हर 24 महीने में।
- तकिया और ऊनी कंबल: हर 24 महीने में।
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