Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    स्मृति शेष: “उजाले अपनी यादों के...” आंखों में तैर गए बशीर बद्र साहब से मुलाकात के वो हसीन लम्हे

    Updated: Fri, 29 May 2026 12:51 AM (IST)

    पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सां ...और पढ़ें

    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो...बशीर बद्र साहब सबकी यादों में रहेंगे। (फोटो- सोशल मीडिया)

    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो...बशीर बद्र साहब सबकी यादों में रहेंगे। (फोटो- सोशल मीडिया)

    HighLights

    1. पत्रकार ने भोपाल में बशीर बद्र से पहली मुलाकात की।

    2. बद्र साहब की सादगी और राष्ट्रवादी विचार थे अद्भुत।

    डॉ चंदन शर्मा, भोपाल। भोपाल से जब एक अखबार में मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ, तो मेरी जॉइनिंग मेरठ में थी। विदाई के वक्त मेरे विभागाध्यक्ष पुष्पेंद्र पाल सिंह सर ने सलाह दी कि बशीर बद्र साहब लंबे समय तक मेरठ में रहे हैं, इसलिए वहां जाने से पहले एक बार उनसे मिलकर शहर के मिजाज को समझ लो। वहां पत्रकारिता करने में आसानी होगी।

    मैं तब माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के फाइनल सेमेस्टर में पढ़ाई कर रहा था। अपने एक मित्र मनीष मोहन भार्गव के साथ पुराने भोपाल में बशीर साहब के घर के लिए ऑटो से रवाना हुआ। पूछते-पूछते आखिर उनके पते पर पहुंच ही गया। जैसे ही मैंने कॉलबेल बजाई, खुद बद्र साहब ने दरवाजा खोला।

    संक्षिप्त परिचय के बाद उन्होंने बेहद गर्मजोशी से हमें अपने ड्राइंग रूम में बैठने को कहा। इसके बाद बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह तकरीबन डेढ़ घंटे तक चलता रहा। मुलाकात के आखिरी में उन्होंने मेरी डायरी पर अपनी कलम से एक बेहद खूबसूरत शेर लिखा:

    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

    आज जब उनके निधन की खबर सुनी, तो 22 साल (जून, 2004) पुराना वह पूरा मंजर मेरी स्मृति पटल पर सजीव हो उठा।

    यूपी से गहरा नाता और जमीनी शख्सियत

    उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े और मेरठ में लंबे समय तक नौकरी करने वाले बशीर साहब का यूपी से बेहद गहरा और लंबा नाता था। किंतु, जब मैंने उनसे पूछा कि क्या उनका वापस मेरठ या यूपी के किसी शहर में बसने का मन है, तो उन्होंने साफ मना कर दिया।

    खबरें और भी

    मेरठ के दंगों में उनके घर को जला दिया गया था, बावजूद बशीर साहब के मन किसी के लिए कोई नकारात्मकता नहीं थी। वे जिंदगी के अच्छे पलों को याद करने और बुरे को भूल जाने की सलाह देते हैं। वे मेरठ की तमाम अच्छी यादों को साझा करते रहे। वहां के बाजार, तंग गलियां और तहजीब—इन सब पर उन्होंने हमसे लंबी चर्चा की, जिससे हमारा काफी ज्ञानवर्धन हुआ।

    बशीर साहब वास्तव में एक राष्ट्रवादी शायर थे। उन्होंने बेहद बेबाकी से हमसे कहा था, "उर्दू तो संस्कृत की ही देन है, सबसे पुरानी भाषा संस्कृत ही है।" वेदों से लेकर गीता तक का उनका ज्ञान अद्भुत था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रति उनका प्रेम जगजाहिर था; बातचीत के दौरान उन्होंने अटल जी की कविताओं को भी बड़े चाव से याद किया।

    जब बशीर साहब ने कहा- "कौन डांट सुने यार!"

    बातों-बातों में उनके मिजाज का एक घरेलू और मजाकिया पहलू भी सामने आया। वे अपनी पत्नी से थोड़ा डरते थे (यह उनकी दूसरी शादी थी)। हमारे साथ चाय का एक दौर खत्म होने के बाद वे मुस्कुराकर बोले, अब एक और चाय पीने की इच्छा तो होगी? चूंकि काफी वक्त हो चुका था, इसलिए हमने शिष्टाचारवश कहा, नहीं सर, कोई बात नहीं। इस पर उन्होंने ठहाका लगाते हुए कहा, "हां यार! सही है, वरना कौन डांट सुने!" हम सब खूब हंसे।

    बशीर साहब से मेरी दूसरी मुलाकात अचानक होशंगाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई। वहां ट्रेन कुछ ज्यादा देर के लिए रुक गई थी। वे अचानक प्लेटफार्म पर दिख गए। मुझे देखते ही पहचान गए और बोले, अरे पत्रकार जी! कहां चल दिए? किस बोगी में हैं आप?

    जब मैंने उनसे पूछा कि आप किसमें हैं, तो उन्होंने सहजता से कहा—एस-5 (स्लीपर क्लास)। मुझे बड़ा अचरज हुआ कि देश का इतना बड़ा नामी शायर और एसी के बजाय स्लीपर क्लास में सफर कर रहा है! वास्तव में बशीर साहब ऐसे ही थे—बिल्कुल जमीनी और सादगी पसंद। उनकी सादगी का अंदाजा उनके इस मशहूर शेर से भी लगाया जा सकता है:

    कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।

    उनकी शायरी में भी यही सादगी और जमीनी जुड़ाव दिखता है, इसीलिए आम आदमी उनकी लेखनी से खुद को जोड़ पाता है। उनकी कई रचनाओं में दुष्यंत कुमार वाला तेवर और अंदाज नजर आता है। भाषा को लेकर उनका साफ मानना था कि रचना ऐसी होनी चाहिए जो सीधे लोगों के दिलो-दिमाग में उतर जाए और सबको समझ आए। हाँ, वे अपनी रचनाओं के मूल्य और कॉपीराइट को लेकर काफी गंभीर रहते थे। वे कहते थे, यही तो रोजी-रोटी है भाई!

    अलविदा उर्दू गजल के उस्ताद!

    पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले लंबे समय से डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) और उम्र संबंधी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके जाने से देश-विदेशी के साहित्य जगत और कला प्रेमियों में शोक की लहर है। वरिष्ठ साहित्यकारों ने इसे 'एक युग का अंत' कहा है।

    15 फरवरी 1935 को जन्मे डॉ. बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पीएचडी की और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएं दीं। उन्होंने गजल विधा को क्लिष्ट शब्दों से निकालकर आम लोगों की जुबान तक पहुंचाया। जैसा कि वे खुद लिख गए हैं:

    लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
    तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

    मेरे जीवन और करियर पर बशीर साहब का असर

    मेरठ जाने के बाद उनसे दोबारा कभी आमने-सामने मिलना तो नहीं हो पाया, लेकिन टीवी और यूट्यूब के जरिए मैं लगातार उन्हें सुनता रहा। उनकी लेखनी अमर है।

    मुझे अपने विश्वविद्यालय (भोपाल) के दिनों की एक घटना याद आती है। वहां एक डिबेट कॉम्पिटिशन (वाद-विवाद प्रतियोगिता) थी, जिसका विषय था—"पाकिस्तान से दोस्ती करनी चाहिए या नहीं?" अधिकांश छात्र 'दोस्ती नहीं करने' के पक्ष में बोलने वाले थे। ऐसे में हमारे विभाग की राखी तिवारी मैम ने मुझसे कहा, चंदन, तुम विपक्ष (दोस्ती के पक्ष) से बोलो। मैंने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।

    जब मैं मंच पर गया, तो मेरे भाषण की पहली लाइन बशीर बद्र साहब का यही अमर शेर था-

    दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
    जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।

    इस शेर के पढ़ते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस प्रतियोगिता में यूनिवर्सिटी में मुझे प्रथम स्थान मिला और मेरे जूनियर रिचिक मिश्रा (जिसने अंग्रेजी में अपनी बात रखी थी) को दूसरा स्थान मिला। इसके बाद हम दोनों को राष्ट्रीय स्तर की डिबेट में भाग लेने के लिए नागपुर भेजा गया था।

    मेरी तरह दुनिया भर के हजारों-लाखों लोगों की जुबान, लेखनी और भाषणों में बशीर बद्र साहब हमेशा जिंदा रहेंगे। उनके शब्दों का उजाला कभी मद्धम नहीं होगा। बद्र साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि और सादर नमन!