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    भोपाल मेट्रो की रफ्तार पर 'घाटे' का ब्रेक... रोज़ाना 8 लाख खर्च, कमाई सिर्फ 15 हजार; घटते यात्रियों के साथ बढ़ी चिंता

    Updated: Thu, 22 Jan 2026 02:32 AM (IST)

    भोपाल मेट्रो के संचालन को एक महीना पूरा हो गया है, लेकिन यह भारी घाटे में चल रही है। रोजाना 8 लाख रुपये खर्च के मुकाबले आय केवल 15 हजार रुपये है। यात् ...और पढ़ें

    भोपाल मेट्रो सेवा (फाइल फोटो)

    भोपाल मेट्रो सेवा (फाइल फोटो)

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    संक्षेप में पढ़ें

    डिजिटल डेस्क, भोपाल। भोपाल मेट्रो का संचालन शुरू हुए एक महीना पूरा हो चुका है, लेकिन शुरुआती उत्साह के बाद इसकी आर्थिक सेहत चिंता का विषय बनती जा रही है। सुभाष नगर से एम्स तक करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर रोजाना मेट्रो चलाने में लगभग 8 लाख रुपये का खर्च आ रहा है, जबकि इसके मुकाबले आय महज 15 हजार रुपये के आसपास सिमटी हुई है। 21 दिसंबर से शुरू हुई सेवा की पहले महीने की बैलेंस शीट ही भारी घाटे की कहानी बयां कर रही है।

    कम यात्री संख्या के चलते मेट्रो प्रबंधन ने 5 जनवरी से सुबह के चार फेरे घटा दिए हैं। पहले जहां मेट्रो रोजाना 17 फेरे लगा रही थी, वहीं अब यह संख्या घटकर 13 रह गई है। इसके बावजूद आमदनी में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है, जिससे प्रबंधन की चिंता और बढ़ गई है।

    फेरे बढ़ाने पर मंथन, मगर सवाल बरकरार

    भोपाल मेट्रो का मासिक संचालन खर्च करीब 2.5 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। यानी हर दिन लाखों रुपये खर्च कर मेट्रो चलाई जा रही है, लेकिन यात्रियों की कमी के कारण आय उम्मीद के अनुरूप नहीं हो पा रही। घाटे से उबरने के लिए प्रबंधन फेरों को दो से तीन गुना बढ़ाने पर विचार कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि जब यात्री ही नहीं बढ़ रहे, तो क्या फेरे बढ़ाने से वाकई फायदा होगा?

    विज्ञापनों से कमाई की उम्मीद

    घाटे की भरपाई के लिए मेट्रो प्रबंधन वैकल्पिक आय स्रोतों पर भी नजरें गड़ा रहा है। इसके तहत प्रायोरिटी कॉरिडोर के आठ मेट्रो स्टेशनों पर विज्ञापन के लिए जगह लीज पर देने के टेंडर निकाले गए हैं। फिलहाल टेंडर खोले जाना बाकी हैं, लेकिन इनके जरिए मेट्रो की आय बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

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    रोजमर्रा के सफर से ज्यादा ‘जॉय राइड’ बनी मेट्रो

    भोपाल मेट्रो को लोग फिलहाल रोजमर्रा के परिवहन के बजाय ‘जॉय राइड’ के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि वीकेंड पर यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है, जबकि सामान्य दिनों में हालात बेहद कमजोर रहते हैं। शुरुआत में जहां रोजाना करीब 7 हजार यात्री सफर कर रहे थे, वहीं अब यह संख्या घटकर महज 300 से 350 प्रतिदिन रह गई है।

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    कुल मिलाकर, भोपाल मेट्रो के सामने सबसे बड़ी चुनौती यात्रियों का भरोसा और संख्या बढ़ाने की है, वरना यह आधुनिक परिवहन व्यवस्था घाटे की पटरी से उतरती नजर आ सकती है।


    जब तक मेट्रो को एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी नहीं मिलेगी, तब तक रेवेन्यू में बड़ी बढ़ोतरी संभव नहीं है। मार्च तक सिग्नलिंग का काम पूरा हो जाएगा, जिसके बाद अतिरिक्त ट्रिप्स चलाई जा सकती हैं और इससे कुछ अतिरिक्त आय हो सकती है।
    - एस. कृष्णा चैतन्य, एमडी, एमपी मेट्रो