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    TB के इलाज में नई उम्मीद : MANIT-AIIMS की रिसर्च से दवाओं के खिलाफ जिद्दी बैक्टीरिया होंगे बेअसर

    Updated: Sun, 08 Mar 2026 07:51 PM (IST)

    मैनिट भोपाल के शोधकर्ता टीबी के दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के इलाज पर काम कर रहे हैं। आईसीएमआर ने इस परियोजना के लिए 1.28 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद दी ...और पढ़ें

    टीबी पर रिसर्च (प्रतीकात्मक चित्र)

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    डिजिटल डेस्क, भोपाल। राजधानी स्थित मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT) के शोधकर्ता एक ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं, जो टीबी के जिद्दी बैक्टीरिया का खात्मा करेगा, जिन पर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस की वजह से अब तक दवाइयां बेअसर साबित होती रही हैं। इस परियोजना के महत्व को देखते हुए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने 1.28 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद मंजूर की है।

    इस अध्ययन का नेतृत्व मैनिट में जैव विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शिवेंद्र के. चौरसिया कर रहे हैं। टीम में एम्स भोपाल में व्यावहारिक चिकित्सा के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जितेन्द्र सिंह और एनआइटी रायपुर के डॉ. अवनीश कुमार भी शामिल हैं।

    बैक्टीरिया का सुरक्षा कवच तोड़ने पर फोकस

    मुख्य शोधकर्ता डॉ. शिवेन्द्र के. चौरसिया ने बताया कि यह अनुसंधान दो चरणों में है। पहले चरण के शोध में पता चला है कि टीबी का बैक्टीरिया (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस) हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं से खुद को बचाने के लिए 'ग्लूटामेट डिकार्बोक्सिलेज' (गैड) नामक एक खास एंजाइम बनाता है। यह एंजाइम बैक्टीरिया के लिए एक सुरक्षा कवच (बायोफिल्म) है, जो शरीर के अम्लीय तनाव को झेलने और जीवित रहने में उसकी मदद करता है। यही कारण है कि बैक्टीरिया दवाओं के प्रति सहनशीलता (ड्रग रेजिस्टेंस) विकसित कर लेता है।

    दूसरे चरण में मरीजों पर अध्ययन

    उन्होंने बताया कि अब शोध का दूसरा चरण शुरू हो रहा है, जिसमें वैज्ञानिक सीधे टीबी के मरीजों पर अध्ययन करेंगे। इस चरण में हमारा लक्ष्य ऐसे 'अवरोधक' विकसित करना है जो 'गैड' एंजाइम को काम करने से पूरी तरह रोक दें। जब यह एंजाइम काम करना बंद कर देगा तो बैक्टीरिया का सुरक्षा कवच टूट जाएगा और वह बेहद कमजोर पड़ जाएगा।

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    सस्ता होगा इलाज

    वर्तमान में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) और एक्सटेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंट (एक्सडीआर) टीबी के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे मरीजों का इलाज दो साल तक चलता है, जो बहुत खर्चीला और कष्टदायक होता है। बैक्टीरिया का कवच टूटते ही पुरानी और सस्ती एंटी-टीबी दवाएं भी इन 'सुपर-बैक्टीरिया' पर फिर से असर करने लगेंगी। नई दवाओं को मौजूदा दवाओं के साथ मिलाकर देने से इलाज की अवधि दो साल से घटकर काफी कम हो सकती है।

    हमने पहले चरण में बैक्टीरिया के जीवित रहने के मुख्य तंत्र (गैड एंजाइम) का पता लगा लिया है। अब दूसरे चरण में हम इस एंजाइम को निष्क्रिय करने पर काम कर रहे हैं। यदि हम इसमें सफल होते हैं, तो दवा-प्रतिरोधी टीबी का सटीक और छोटा इलाज संभव हो सकेगा, जिससे हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकेगी।
    - डॉ. शिवेन्द्र के. चौरसिया, मैनिट भोपाल