मध्य प्रदेश कांग्रेस में आपस में लड़ रहे नेता, संगठन सृजन अभियान के परिणाम पर भी सवाल
मध्य प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व के वर्चस्व को लेकर घमासान मचा हुआ है, जिससे अंतर्कलह सड़क पर आ गई है। संगठन सृजन अभियान के परिणामों पर सवाल उठ रहे है ...और पढ़ें

दिग्विजय सिंह एवं जीतू पटवारी (फाइल फोटो)
HighLights
मध्य प्रदेश कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई और अंतर्कलह तेज।
संगठन सृजन अभियान के परिणामों पर गंभीर सवाल उठे।
वरिष्ठ नेताओं में सार्वजनिक मतभेद, केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग।
राज्य ब्यूरो, भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों वर्चस्व की लड़ाई को लेकर घमासान मचा हुआ है। अंतर्कलह सड़क पर आ चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हों या फिर प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह हों, विभिन्न मुद्दों पर मतांतर सामने आ रहे हैं। इससे संगठन सृजन के परिणाम पर सवाल भी खड़े हो गए हैं।
केंद्रीय नेतृत्व से हस्तक्षेप की मांग
दरअसल, संगठन के सशक्तीकरण के लिए संगठन सृजन अभियान चलाया गया था। दावा किया गया था कि पूरी कांग्रेस एकजुट है। अभियान में बिना सिफारिश के उत्साही पदाधिकारियों को चुनने का दावा किया गया था लेकिन स्थिति इससे उलट नजर आ रही है। नेता सार्वजनिक रूप से लड़ाई से भी बाज नहीं आ रहे। इस बीच पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने केंद्रीय नेतृत्व से हस्तक्षेप करने की मांग की है, ताकि कार्यकर्ताओं को एकजुट कर भाजपा से मुकाबले के लिए प्रेरित किया जा सके।
निजी महत्वाकांक्षाएं पड़ रही भारी
नगरीय निकाय, विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी हार का सामने करने के बाद कांग्रेस द्वारा कराई गई समीक्षा में यह बात निकलकर सामने आई थी कि संगठन चरमरा गया है। वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय नहीं है और निजी महत्वाकांक्षाएं भारी पड़ रही हैं।
संगठन सृजन की कवायद पर प्रश्नचिह्न
इसे देखते हुए वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की पहल पर नए सिरे से संगठन खड़ा करने की कवायद प्रारंभ हुई। विधानसभा चुनाव में हारने के बाद भी जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी उमंग सिंघार को दी गई। इसके बाद तेरा-मेरा की परंपरा को समाप्त करते हुए संगठन सृजन अभियान चलाया गया। जिला और ब्लॉक अध्यक्ष नियुक्त किए गए। पंचायत स्तर तक संगठन खड़ा करने की कवायद हुई लेकिन नतीजा शून्य नजर आ रहा है।
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पार्टी की अंतर्कलह सार्वजनिक
पिछले कुछ महीनों में जो घटनाएं सामने आईं, उससे कार्यकर्ता असमंजस में हैं। नियुक्तियों को लेकर दिग्विजय सिंह का जीतू पटवारी पर कटाक्ष हो या फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर आयोजित पत्रकारवार्ता में प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से दिग्विजय सिंह के तीखा संवाद, सभी ने यह सिद्ध कर दिया कि पार्टी में सब-कुछ ठीक नहीं है। हाल ही में मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव और उनके परिवारजन की भूमि से जुड़े मामले में जो अलग-अलग राय सामने आई, उसने पार्टी की अंतर्कलह को सड़क पर ला दिया।
यही नहीं, राज्य सरकार द्वारा वीर भारत न्यास को सरकारी जमीन दिए जाने को जीतू पटवारी ने 500 करोड़ का घोटाला बताया तो दिग्विजय सिंह ने क्लीनचिट दे दी। इसके बाद पार्टी की राजनीतिक मामलों की बैठक में जिस तरह का संवाद हुआ, उससे एक बात तो साफ हो गई कि पार्टी के भीतर इस घटनाक्रम को गंभीरता से लिया गया।
नेताओं की अलग-अलग राय
वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यदि तथ्यात्मक रूप से कोई त्रुटि हो भी गई थी तो भी उसे सार्वजनिक मंच पर नहीं लाया जाना चाहिए था और कम से कम दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता से तो इसकी अपेक्षा नहीं की जाती है। यही कारण है कि मामला केंद्रीय संगठन तक पहुंचा। हालांकि, कुछ लोग पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को जिस तरह से निशाने पर लिया जा रहा है, उसे भी अनुचित बता रहे हैं। वहीं, कुछ इसे पटवारी की राह में रोड़ा अटकाने के तौर पर भी देख रहे हैं।
सबकी अपनी-अपनी लाइन
उधर, पार्टी के वरिष्ठ नेता अपनी-अपनी लाइन पर चल रहे हैं। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह प्रदेशव्यापी दौरे पर निकले हुए हैं तो अरुण यादव की सक्रियता निमाड़ तक सीमित होकर रह गई है। पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ परिदृश्य से बाहर हैं तो पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह यदा-कदा ही नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पीढ़ी परिवर्तन भले ही पार्टी ने कर दिया हो लेकिन इसे वरिष्ठ नेताओं ने आत्मसात नहीं किया है।