MP में Hepatitis-C के जीनोटाइप-4 की दस्तक, हमीदिया में भर्ती टीबी मरीज में मिला दुर्लभ वैरिएंट; मध्य भारत में पहला मामला
हमीदिया अस्पताल, भोपाल में एक टीबी मरीज में हेपेटाइटिस-सी का दुर्लभ जीनोटाइप-4 वैरिएंट मिला है। मध्य भारत में इस वैरिएंट ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।
HighLights
हमीदिया अस्पताल में मिला हेपेटाइटिस-सी जीनोटाइप-4 वैरिएंट।
मध्य भारत में इस दुर्लभ वैरिएंट की पहली बार पुष्टि हुई है।
यह वैरिएंट लिवर सिरोसिस, लिवर के कैंसर का खतरा बढ़ाता है।
मुकेश विश्वकर्मा, भोपाल। हमीदिया अस्पताल में भर्ती छतरपुर के एक मरीज में हेपेटाइटिस-सी का जीनोटाइप-4 वैरिएंट मिला है। इसे अभी तक पाए गए जीनोटाइप-3 और जीनोटाइप-1 से अधिक खतरनाक बताया जा रहा है। गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य भारत में इस वैरिएंट की मौजूदगी की पुष्टि का यह पहला मामला है।
जांच में सामने आया नया वैरिएंट
26 वर्षीय यह मरीज हमीदिया अस्पताल में टीबी के इलाज के लिए भर्ती था। इसके साथ ही उसे गंभीर पीलिया जैसे लक्षण भी थे। डॉक्टरों ने जांच की तो उसमें हेपेटाइटिस की पुष्टि हुई। यह टीबी के साथ हेपेटाइटिस का जटिल मामला था, इसलिए इस पर विशेष अनुसंधान टीम ने भी काम शुरू किया। मरीज के नमूनों की जांच में सामने आया कि हेपेटाइटिस वायरस का वैरिएंट इस क्षेत्र में मौजूद वैरिएंट से अलग था। बाद में इसकी पहचान जीनोटाइप-4 के रूप में हुई।
समय पर जरूरी है इलाज
विशेषज्ञों का कहना है कि जीनोटाइप-4 का अगर समय पर इलाज न मिले तो लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी स्थितियों का खतरा सामान्य वैरिएंट के मुकाबले बढ़ा देता है। टीबी या अन्य बीमारी के साथ यह वैरिएंट मिल जाए तो लिवर पर दोहरा हमला होता है और नुकसान की गति बहुत तेज हो जाती है। हमीदिया अस्पताल और क्षेत्रीय श्वसन रोग संस्थान में छह दिनों की गहन निगरानी में मरीज का लिवर एंजाइम सामान्य रखा जा सका।
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भारत में इसके केस एक से डेढ़ प्रतिशत
गेस्ट्रोइंटेरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डा. शैलेंद्र जैन के अनुसार यह वैरिएंट आमतौर पर अफ्रीकी और मध्य-पूर्व देशों में पाया जाता है। भारत में हेपेटाइटिस-सी के ज्यादातर मरीजों में जीनोटाइप-1 और जीनोटाइप-3 मिलता है। जीनोटाइप-4 उत्तर भारत में सिर्फ 0.24% से 1.5% तक मरीजों में ही मिलता है। मध्य प्रदेश में इसका यह पहला पंजीकृत मामला है।
समय पर पहचान और निगरानी से हम मरीज के लिवर को बचा पाए। इस वैरिएंट पर अब नजर रखना जरूरी है।
-डॉ. सौरभ जैन, क्षेत्रीय श्वसन रोग संस्थान, जीएमसी भोपाल
