कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी करने वाले मंत्री विजय शाह को क्यों बचा रही मध्य प्रदेश सरकार?
मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट में मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमा न चलाने के अपने फैसले का बचाव करेगी।

विजय शाह को क्यों बचा रही मध्य प्रदेश सरकार। (फाइल)
HighLights
MP सरकार सुप्रीम कोर्ट में मंत्री विजय शाह का बचाव करेगी।
मंत्री शाह का आदिवासी राजनीति में गहरा प्रभाव है।
कैबिनेट ने शाह पर मुकदमा न चलाने का फैसला किया।
डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार सु्प्रीम कोर्ट में अपने उस फैसले पर बचाव की तैयारी कर रही है, जिसके तरह उसने सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में विवादास्पद टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री कुंवर विजय शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी थी।
कानूनी विशेषज्ञों, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जांच-पड़ताल के बाद आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का जवाब दाखिल किए जाने की उम्मीद है। इस जवाब के केंद्र में पांच बिंदुओं वाला बचाव है, जिसमें बताया गया है कि कैबिनेट का मानना है कि शाह पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने 25 अगस्त को शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी न देने का फैसला किया था। इसके बाद यह सिफारिश गर्वनर मंगूभाई पटेल को भेजी गई, जिन्होंने कैबिनेट के फैसले को मंजूरी दे दी। अब सरकार अपने तर्कों को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखेगी।
विजय शाह के खिलाफ कार्रवाई से क्यों हिचकिचा रही सरकार?
यह सवाल हर राजनीतिक गलियारों में उठ रहा है कि आखिर मोहन सरकार की ऐसा क्या मजबूरी है कि वे मंत्री विजय शाह के खिलाफ कार्रवाई से क्यों हिचकिचा रही है।
1990 से लगातार आठ बार के विधायक
इसका जवाब बीजेपी और मध्य प्रदेश की आदिवासी राजनीति में शाह के खास राजनीतिक रसूख में छिपा है। विजय शाह कोई आम मंत्री नहीं है।
उन्होंने 1990 से लगातार आठ बार विधानसभा चुनाव जीते हैं और तीन दशकों से भी ज्यादा समय से मध्य प्रदेश की राजनीति में बने हुए हैं। विधायक के तौर पर अपने आठ कार्यकालों के दौरान, उन्होंने उमा भारती के दौर से लेकर मौजूदा मोहन यादव सरकार तक में काम किया है।
इन सालों में शाह ने पांच अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने तीन बार अदिवासी कल्याण विभाग और दो बार वन विभाग का नेतृत्व किया है। उन्होंने स्कूल शिक्षा, पर्यटन और संस्कृति और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभागों का भी कार्यभार संभाला है।
जमीनी स्तर पर गहरा राजनीतिक प्रभाव
सरकार में इतने लंबे समय तक बने रहने के साथ जमीनी स्तर पर उनका गहरा राजनीतिक प्रभाव भी रहा है। शाह मकराई राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं और राजगोंड समुदाय से आते हैं। उन्हें मध्य प्रदेश में बीजेपी के सबसे प्रमुख आदिवासी चेहरों में से एक माना जाता है, खासकर गोंड वोटरों के बीच।
अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत
मध्य प्रदेश की आबादी में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत है। राज्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जबकि आदिवासी वोटर कई अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों को भी प्रभावित करते हैं। कुल मिलाकर, आदिवासी-बहुल सीटों की विधानसभा में बड़ी हिस्सेदारी है।
गोंड समुदाय राज्य के सबसे बड़े आदिवासी समूहों में से एक है और मध्य प्रदेश की आदिवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। इस सामाजिक वर्ग में शाह की स्थिति उन्हें उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र से कहीं ज़्यादा राजनीतिक महत्व दिलाती है। यही वजह है कि उनके खिलाफ सरकार कार्रवाई करके राजनीतिक रूप से जोखिम नहीं लेना चहती है।
