1000 साल पुराने अभिलेख ने खोला भोजकालीन धार का राज, सामने आए मूर्तिकार और शिल्पकार के नाम; मां वाग्देवी से भी जुड़ी कड़ी
राजा भोज के शासनकाल के धार से मिले 1000 साल पुराने अभिलेख के नए अध्ययन से देवी अंबिका की मूर्ति ...और पढ़ें

मूर्ति के आधार पर उत्कीर्ण शिलालेख। इसी शिलालेख के नए सिरे से अध्ययन से मणथला और शिवदेव जैसे शिल्पकारों के नाम सामने आए हैं। - स्रोत : जर्नल आफ द रायल एशियाटिक सोसाइटी/ब्रिटिश म्यूजियम
HighLights
देवी अंबिका मूर्ति के मूर्तिकार मणथला, अभिलेखकार शिवदेव के नाम सामने आए।
प्राचीन अभिलेख में वाग्देवी और जैन प्रतिमाओं का भी उल्लेख मिलता है।
इंडोस्क्रिप्ट डिजिटल उपकरण से घिसे अक्षरों का पुनः अध्ययन किया गया।
प्रेमविजय पाटिल, धार। राजा भोज के शासनकाल की धार से जुड़ा करीब एक हजार वर्ष पुराना अभिलेख अब इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने ला रहा है। लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित देवी अंबिका की मूर्ति के आधार पर उत्कीर्ण अभिलेख के नए अध्ययन में उस दौर के मूर्तिकार और अभिलेख उकेरने वाले शिल्पकार के नाम सामने आए हैं।
नए अध्ययन के अनुसार मणथला ने देवी अंबिका की मूर्ति का निर्माण किया था, जबकि शिवदेव ने मूर्ति के आधार पर अभिलेख उत्कीर्ण किया था। यह जानकारी भोजकालीन धार की कला, शिल्प परंपरा और धार्मिक गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह अभिलेख विक्रम संवत 1091 यानी 1034-35 ईस्वी का है। शोधकर्ता माइकल विलिस के अनुसार यह समय राजा भोज के शासनकाल के मध्य का था।
एक ही अभिलेख में वाग्देवी और जैन प्रतिमाओं का उल्लेख
अभिलेख की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ देवी अंबिका की मूर्ति का विवरण नहीं है। इसमें पहले वाग्देवी की स्थापना, उसके बाद तीन जैन प्रतिमाओं की स्थापना और फिर अंबिका की मूर्ति बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
इससे भोजकालीन धार में विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़ी प्रतिमाओं की स्थापना की जानकारी मिलती है। साथ ही यह अभिलेख ऐतिहासिक भोजशाला और वाग्देवी की परंपरा से जुड़े अध्ययन के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करता है।
घिसे अक्षरों को डिजिटल तकनीक से फिर पढ़ा गया
यह नई जानकारी ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस की शोध पत्रिका जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के शोधपत्र से सामने आई है। शोधपत्र का शीर्षक ‘धार, भोज एंड सरस्वती : एन ओल्ड प्रॉब्लम रीविजिटेड’ है।
शोधकर्ता के मुताबिक, अभिलेख का पाठ इससे पहले 2012 में प्रकाशित किया जा चुका था। हालांकि, समय के साथ पत्थर की सतह घिसने और उस पर बनी तिरछी दरारों के कारण कई अक्षरों को पढ़ना मुश्किल था।
इस बार ‘इंडोस्क्रिप्ट’ डिजिटल उपकरण और विशेष रूप से तैयार की गई तस्वीरों की मदद से अभिलेख का दोबारा अध्ययन किया गया। नए अध्ययन के आधार पर इसके पाठ और अर्थ की पुनर्व्याख्या की गई।
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छोटी महिला आकृति से मिला नई पढ़त का सुराग
अध्ययन में एक दिलचस्प मोड़ मूर्ति के आधार पर बनी घुटने के बल बैठी छोटी महिला आकृति से आया। शोधकर्ता ने मध्यकालीन भारतीय कला परंपरा के आधार पर इसे मूर्ति की दाता के रूप में देखा—अर्थात वह महिला जिसने मूर्ति की स्थापना कराई थी।
इसी आकृति और अभिलेख के पुनर्पाठ के आधार पर दाता का नाम सोसा सामने आया। शोध के अनुसार सोसा जैन धर्म की विद्याधरी शाखा से जुड़ी महिला अनुयायी थीं।
1875 में धार के सिटी पैलेस में मिली थी मूर्ति
देवी अंबिका की यह मूर्ति वर्ष 1875 में धार के सिटी पैलेस से मिली थी। वर्तमान में यह मूर्ति ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन के संग्रह में संरक्षित है।
करीब एक हजार वर्ष पुराने अभिलेख के नए अध्ययन से अब मूर्ति के निर्माण से जुड़े मणथला और अभिलेखकार शिवदेव के नाम सामने आए हैं। इससे भोजकालीन धार में मूर्तिकला और अभिलेख लेखन की परंपरा को समझने के लिए इतिहासकारों को नया आधार मिला है।
क्या है इंडोस्क्रिप्ट?
इंडोस्क्रिप्ट प्राचीन भारतीय अभिलेखों के अध्ययन में मदद करने वाला डिजिटल शोध उपकरण है। इसकी सहायता से पुराने, घिसे या अस्पष्ट अभिलेखों में मौजूद अक्षरों और लिपि को पहचानने तथा उनके पाठ को समझने में शोधकर्ताओं को मदद मिलती है।
