कान्हा रिजर्व में एक माह के भीतर 8 बाघों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र-राज्य सरकार से मांगी रिपोर्ट
कान्हा टाइगर रिजर्व में एक माह के भीतर आठ बाघों की मौत पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को प्रभावी रोकथाम और उ ...और पढ़ें

HighLights
हाईकोर्ट ने कान्हा में 8 बाघों की मौत पर चिंता जताई।
केंद्र-राज्य सरकार को प्रभावी रोकथाम और उपचार के निर्देश।
संक्रमण स्रोत, कुत्तों को क्वारंटीन करने पर विस्तृत ब्यौरा तलब।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। कान्हा टाइगर रिजर्व में एक माह के भीतर आठ बाघों की मौत के मामले ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की चिंता बढ़ा दी है। कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) संक्रमण से हुई इन मौतों को गंभीर मानते हुए अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को संयुक्त रूप से प्रभावी रोकथाम और उपचारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संक्रमण की रोकथाम के लिए अब तक की गई कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा भी तलब किया गया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में प्रशासनिक न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि बाघों की सुरक्षा से जुड़े सभी वैधानिक और प्रशासनिक प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
संक्रमण के स्रोत और रोकथाम पर मांगा जवाब
अदालत ने विशेष रूप से यह जानकारी मांगी है कि रिजर्व क्षेत्र में संक्रमण के संभावित स्रोत माने जा रहे कुत्तों को क्वारंटीन करने तथा वायरस के प्रसार को रोकने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित विभागों को निर्देशों के अनुपालन पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है।
जनहित याचिका में उठे गंभीर सवाल
मुंबई निवासी अधिवक्ता सुब्रत चक्रवर्ती द्वारा दायर जनहित याचिका में दावा किया गया है कि अप्रैल और मई 2026 के दौरान कान्हा टाइगर रिजर्व में कई बाघों की असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई। इनमें बाघिन टी-122 (सुनैना), बाघिन टी-141 (अमाही), उसके चार अर्धवयस्क शावक और युवा नर बाघ टी-220 (महावीर) शामिल हैं। इसके अलावा इसी अवधि में दो अन्य वयस्क नर बाघ भी मृत पाए गए थे।
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याचिका में कहा गया है कि लगातार हुई इन मौतों ने कान्हा में रोग निगरानी, जैव-सुरक्षा और वन्यजीव स्वास्थ्य प्रबंधन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
दिशा-निर्देशों के पालन पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता का तर्क है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, प्रोजेक्ट टाइगर और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा बाघों की वैज्ञानिक निगरानी, रोग नियंत्रण, पशु चिकित्सा सुविधाओं और आवास प्रबंधन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं।
इसके बावजूद संक्रमण नियंत्रण और स्वास्थ्य निगरानी से जुड़े उपायों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। ऐसे में बाघों की सुरक्षा के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
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‘वन्यजीव धरोहर की सुरक्षा में चूक बर्दाश्त नहीं’
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि देश की अमूल्य वन्यजीव धरोहर की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में किसी भी स्तर की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने सरकारों से अपेक्षा की है कि संक्रमण नियंत्रण, उपचार और निगरानी संबंधी सभी आवश्यक कदम तत्काल प्रभाव से लागू किए जाएं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह और प्रतीक रूसिया ने पक्ष रखा।