एमपी हाई कोर्ट का अहम फैसला, गलत वेतन निर्धारण पर कर्मचारी से वसूली नहीं; सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि वेतन निर्धारण में हुई विभागीय त्रुटि का आर्थिक बोझ तृतीय श्रेणी कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने रा ...और पढ़ें

मप्र हाईकोर्ट भवन (फाइल फोटो)
HighLights
वेतन निर्धारण में विभागीय त्रुटि का बोझ कर्मचारी पर नहीं।
गलती करने वाले अधिकारियों से हो वेतन की वसूली।
सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह फैसले का दिया हवाला।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वेतन निर्धारण में हुई विभागीय त्रुटि का आर्थिक बोझ किसी तृतीय श्रेणी कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि वेतन निर्धारण में गलती अधिकारियों की है तो उसकी वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से की जानी चाहिए, न कि कर्मचारी से।
क्या था मामला
राज्य सरकार का तर्क था कि 7 नवंबर 2007 के परिपत्र के अनुसार सब-इंस्पेक्टर का संशोधित वेतनमान 1 सितंबर 2007 से प्रभावी होना था। लेकिन कर्मचारी मनोज कुमार सिंह को यह लाभ 1 अप्रैल 2006 से ही दे दिया गया था। इसी आधार पर अप्रैल 2006 से अगस्त 2007 तक दी गई अतिरिक्त राशि की रिकवरी का प्रस्ताव रखा गया था।
कर्मचारी की नहीं थी कोई भूमिका
कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान यह तथ्य निर्विवाद रहा कि मनोज कुमार सिंह न तो वेतन निर्धारण करने वाले अधिकारी थे और न ही ड्राइंग एवं डिस्बर्सिंग अथॉरिटी। वह तृतीय श्रेणी कर्मचारी हैं और वेतन निर्धारण प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
यह भी पढ़ें- IAS संतोष वर्मा के खिलाफ NSA कार्रवाई की मांग हाईकोर्ट ने ठुकराई, जनहित याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित रफीक मसीह फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारी से राशि की वसूली न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती। यदि वेतन निर्धारण में त्रुटि हुई है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी।
खबरें और भी
इन्हीं आधारों पर अदालत ने माना कि राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका में कोई नया या पुनर्विचार योग्य आधार नहीं है और उसे निरस्त कर दिया।