जोसेफ पुलित्जर: वेटर का काम किया तो कभी धोये झूठे बर्तन, आज उनके सम्मान में दिया जाता है पत्रकारिता का बेस्ट अवार्ड
पत्रकार जोसेफ पुलित्जर ने पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। वह खबरों के माध्यम से न केवल लोगों की आवाज बनें, बल्कि खबरों को रोचक बनाने के लिए उन्होंने सरल ...और पढ़ें

कौन थे जोसेफ पुलित्जर।
HighLights
पुलित्जर का जन्म 1847 को हंगरी में हुआ था।
जोसेफ पुलित्जर के सम्मान में हर साल पुलित्जर अवार्ड दिया जाता है।
एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। पत्रकारिता की दुनिया में 'जोसेफ पुलित्जर' आज किसी परिचय का मोहजात नहीं है। जोसेफ पुलित्जर का जन्म आज ही के दिन यानी 10 अप्रैल, 1847 को हंगरी में हुआ था। पत्रकारिता की दुनिया में पुलित्जर को बड़े ही आदर व सम्मान के साथ याद किया जाता है।
पुलित्जर एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने न केवल पत्रकारिता को आम नागरिकों की आवाज बनाया, बल्कि उन्होंने विज्ञापन आधारित प्रणाली को अपनाकर अखबारों को आर्थिक रूप से मजबूत भी बनाया।
गरीबी में पले-बढ़े पुलित्जर किसी रोज सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते हैं। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके करियर की शुरुआत एक संयोग के साथ शुरू हुई थी। लेकिन पुलित्जर ने पत्रकारिता क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यही वजह है कि पत्रकारिता, साहित्य व अन्य रचनात्मक क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए हर साल कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा पुलित्जर अवार्ड दिया जाता है।
बचपन में उठा सिर से पिता का साया
जोसेफ पुलित्जर का जन्म हंगरी के मको शहर में हुआ था। पुलित्जर के सिर से बचपन में ही उनके पिता का साया उठ गया था। घर के माली हालात ठीक नहीं थे, जिसके कारण उनका बचपन बेहद ही गरीबी व बदहाली में बीता। घर में आर्थिक कठिनाई के कारण उन्होंने बेहद ही कम उम्र में अपना घर छोड़ दिया था। पुलित्जर ऑस्ट्रिया, फ्रांस और ब्रिटेन की सेना में भर्ती होना चाहते थे। लेकिन कमजोर शरीर और आंखों में परेशानी के कारण उन्हें अपने सपनों से समझौता करना पड़ा।
उच्च शिक्षा नहीं कर सके हासिल
जोसेफ पुलित्जर बेहद ही गरीब परिवार में पले-बढ़े थे। परिवार में आर्थिक तंगी के कारण वह उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर पाए। बाद में वह अमेरिका गए और उन्होंने कानून की पढ़ाई की। इसके बाद 1864 में वह लिंकन कैवेलरी में शामिल हो गए।
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जीवन यापन के लिए किए छोटे-मोटे काम
पुलित्जर के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए कई छोटे-मोटे काम करने के लिए विवश होना पड़ा। उन्होंने कभी स्टेशन पर बतौर वेटर के रूप में काम किया, तो कभी उन्हें कचरों की देखभाल और झूठे बर्तन तक धोने पड़े। लेकिन इसी दौरान उन्हें एक रेलरोड कंपनी में नौकरी मिली। नौकरी करने के दौरान ही उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू कर दी।

लाइफ का टर्निंग पॉइंट
साल 1868 पुलित्जर के जीवन का एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। दरअसल एक दिन की बात है जब पुलित्जर लाइब्रेरी में बैठकर चेस मैच देख रहे थे। इसी दौरान उन्होंने खेल पर एक शानदार टिप्पणी की। पुलित्जर की इस बात से वहां बैठा एक व्यक्ति बहुत ज्यादा प्रभावित हो गया। बता दें, यह व्यक्ति कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जर्मन अखबार के संपादक थे। वे जोसेफ पुलित्जर से इतने ज्यादा प्रभावित हो गए कि उन्होंने बगैर देरी किए पुलित्जर को नौकरी की पेशकश कर दी। नौकरी करने के पांच साल बाद पुलित्जर ने अपना खुद का अखबार शुरू किया, जिसका नाम 'न्यूयॉर्क वर्ल्ड' था।
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लोगों की आवाज बनें
पुलित्जर न्यूयॉर्क वर्ल्ड नामक अखबार के माध्यम से आम लोगों की आवाज बनें। उन्होंने गरीब, मजदूरों और भ्रष्टाचार जैसे मुख्य मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया। साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कई अभियान भी किए। उन्होंने खबरों को आम लोगों तक आसान, सरल व आकर्षक तरीके से पहुंचाने में मदद की। खबर को रोचक और आसान बनाने के लिए आकर्षक प्रस्तुति जैसे चित्र, कॉमिक्स, छोटे पैराग्राफ का इस्तेमाल भी किया।