बांकीपुर बन सकता है विपक्षी राजनीति का नया लॉन्चिंग पैड, तेजस्वी और पीके के लिए आसान नहीं लड़ाई
बांकीपुर उपचुनाव प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य और बिहार में विपक्षी राजनीति की अगली धुरी तय करेगा। ...और पढ़ें

बांकीपुर बन सकता है विपक्षी राजनीति का नया लॉन्चिंग पैड।
HighLights
प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर उपचुनाव अंतिम राजनीतिक परीक्षा।
तेजस्वी यादव के विपक्षी नेतृत्व की भी बड़ी चुनौती।
भाजपा का गढ़ बांकीपुर, सम्राट चौधरी की साख दांव पर।
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। बिहार के बांकीपुर के अलावा देश की दो अन्य सीटों पर भी गुरुवार को मतदान होना है, मगर सबसे अधिक निगाहें बांकीपुर पर टिकी हैं। यह सामान्य उपचुनाव नहीं है।
रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर के लिए यह अंतिम राजनीतिक परीक्षा है। हार हुई तो उनकी राजनीतिक संभावनाओं को गंभीर झटका दे सकती है।
बांकीपुर उपचुनाव पर सबकी नजर
यह चुनाव इस बात का भी संकेत देगा कि बिहार में विपक्षी राजनीति की अगली धुरी कौन होगी, भाजपा की सांगठनिक ताकत कितनी मजबूत है और क्या प्रशांत किशोर विपक्ष की नई राजनीति के लॉन्चिंग पैड तक पहुंच पाएंगे।
सियासी गहमागहमी के बीच दो सप्ताह के यूरोप दौरे से लौटे तेजस्वी यादव के सामने भी बिहार में विपक्ष का निर्विवाद चेहरा बने रहने की चुनौती है। जाहिर है, बांकीपुर का परिणाम कई राजनीतिक सवालों के जवाब एक साथ देगा।
तेजस्वी यादव पर विपक्षी गठबंधन का पूरा दारोमदार
लालू यादव की राजनीति के नेपथ्य में जाने के बाद विपक्षी गठबंधन का पूरा दारोमदार तेजस्वी यादव पर है। अभी तक वह बिहार में भाजपा विरोधी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा हैं।
यदि राजद अपना जनाधार बनाए रखने में सफल रहता है तो तेजस्वी की स्थिति मजबूत बनी रहेगी, लेकिन प्रशांत किशोर के मजबूत प्रदर्शन की स्थिति में विपक्ष के नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ना तय है। यह सवाल भी उठेगा कि आने वाले चुनावों में भाजपा को चुनौती कौन दे सकता है।
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बांकीपुर में कांग्रेस की उदासीनता
बांकीपुर में कांग्रेस की उदासीनता को राजद के प्रति असहयोग के रूप में देखा जा रहा है। प्रशांत किशोर भी कई बार संकेत दे चुके हैं कि बिहार में राजद से निराश कांग्रेस एवं अन्य छोटे दलों के साथ नई राजनीतिक संभावनाएं बन सकती हैं।
इस चुनाव में भी प्रशांत राजद के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। ऐसे में यदि उन्हें सफलता मिलती है तो कांग्रेस के लिए भी उनके साथ आगे बढ़ने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
प्रशांत किशोर के लिए करो या मरो का चुनाव
पिछले चार वर्षों से जन सुराज अभियान के जरिए वैकल्पिक राजनीति की जमीन तैयार करने में जुटे प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसा है। गांव-गांव की पदयात्रा के जरिए उन्होंने नया राजनीतिक विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया, लेकिन विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली।
यदि बांकीपुर में जीत दर्ज करते हैं तो न केवल उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता बनी रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें विपक्ष के संभावित चेहरे के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन हार की स्थिति में रास्ता कठिन हो जाएगा।
बांकीपुर भाजपा का मजबूत गढ़
भाजपा के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है। बांकीपुर लंबे समय से पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद यह सीट रिक्त हुई है। इसलिए इसे बरकरार रखना राष्ट्रीय नेतृत्व की विश्वसनीयता और क्षमता की भी परीक्षा है।
भाजपा की जीत से मजबूत होगी सम्राट चौधरी की साख
यदि भाजपा यह सीट बचाने में सफल रहती है तो बिहार में नीतीश कुमार के बाद बनी सम्राट चौधरी सरकार की राजनीतिक साख और मजबूत होगी। विपरीत नतीजा आने पर विपक्ष इसे भाजपा की कमजोर होती पकड़ के रूप में प्रचारित करने की कोशिश करेगा।