आरएसएस के प्रचारक से सुवेंदु की कैबिनेट में एंट्री तक... जानिए कैसा रहा दिलीप घोष का राजनीतिक सफर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी की जीत के बाद दिलीप घोष ने मंत्री पद की शपथ ली है। सुवेंदु अधिकारी के अलावा बीजेपी की जीत में दिलीप घोष का ...और पढ़ें
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दिलीप घोष की बंगाल राजनीति (फोटो-पीटीआई)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की जीत की कहानी सिर्फ इन पांच सालों में नहीं लिखी गई, बल्कि इसके पीछे कई नेताओं की सालों की मशक्कत है।
सुवेंदु अधिकारी ने जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वहीं उनके साथ पांच मंत्रियों ने भी शपथ ली। बीजेपी बंगाल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का नाम भी इन मंत्रियों की लिस्ट में शामिल है।
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बंगाल की राजनीति में दिलीप घोष की वापसी
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विधानसभा चुनावों में दो बार हराने के बाद जहां सुवेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। वहीं इस बार के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत से दिलीप घोष की राजनीति की दूसरी पारी की शुरुआत हो गई है।
बंगाल में पार्टी के सबसे जाने-पहचाने और जुझारू चेहरों में से एक दिलीप घोष ने बीजेपी को एक छोटी-मोटी पार्टी से TMC का प्रमुख प्रतिद्वंदी बना दिया।
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दिलीप घोष ने की पार्टी की नींव मजबूत
दिलीप घोष बेबाक बातें और जमीनी स्तर की राजनीति के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने 2015 से 2021 के बीच राज्य में बीजेपी के संगठन को बढ़ाया। उन्होंने बंगाल में पार्टी की नींव को मजबूत करने का काम किया।
बीजेपी को बंगाल में बड़ी सफलता 2019 के लोकसभा चुनावों में मिली थी, जब पार्टी ने बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीतीं। बीजेपी के लिए इस चुनाव ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया। दिलीप घोष मेदिनीपुर से सांसद चुने गए।
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पार्टी के अंदर ही राजनीति में भी फंसे घोष
दिलीप घोष के सांसद बनने के साथ ही संवेदनशील 'जंगलमहल' क्षेत्र में राजनीतिक रूप से उनका प्रभाव और भी मजबूत हो गया। फिर भी, इसके बाद कुछ वर्षों में ही कभी दबदबा रखने वाले यह नेता पार्टी के भीतर एक अजीब से राजनीतिक असमंजस में फंसते हुए दिखाई दिए।
बंगाल बीजेपी के भीतर धीरे-धीरे समीकरण बदलने लगे थे। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद राज्य नेतृत्व के कुछ वर्गों के साथ उनके मतभेद और भी गहरे हो गए, जब घोष ने अपने उत्तराधिकारी सुकांत मजूमदार के नेतृत्व में लिए गए सांगठनिक फैसलों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की।
दिलीप घोष को उनके गढ़ मेदिनीपुर से हटाकर बर्धमान-दुर्गापुर भेजे जाने पर, वह यह सीट हार गए। उन्होंने खुले तौर पर पार्टी के भीतर की चल रही कलह की बुराई की और चुनाव प्रचार के लचर प्रबंधन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।
घोष की इन टिप्पणियों ने राज्य इकाई के भीतर चल रहे गुटबाजी के तनाव को उजागर कर दिया। यह तनाव तब और भी ज्यादा साफ तौर पर दिखाई दिया, जब घोष अपनी नवविवाहित पत्नी के साथ दीघा में जगन्नाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। वहां उन्हें कुछ देर के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से शिष्टाचार-मुलाकात करते हुए देखा गया।
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दिलीप घोष ने नहीं छोड़ा BJP का साथ
बंगाल BJP ने दिलीप घोष की ममता बनर्जी के साथ हुई मुलाकात का आधिकारिक तौर पर बहिष्कार किया था। इस घटना को लेकर राज्य नेतृत्व के कुछ वर्गों ने उनकी आलोचना की। फिर भी, उन पुरानी तनातनी को एक तरफ रखते हुए, घोष BJP की राजनीतिक रणनीति में फिर से उभरकर सामने आए।
2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू होने पर, उनके सांगठनिक अनुभव और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव को एक बार फिर पार्टी के लिए कीमती पूंजी माना गया और आखिरकार, पार्टी ने इन चुनावों में शानदार जीत हासिल की।
घोष ने खड़गपुर सदर सीट पर जीत दर्ज की। ये वही सीट है, जहां से उन्होंने कभी चुनावी राजनीति में अपने सफर की शुरुआत की थी और इस जीत के साथ उन्होंने TMC के मौजूदा विधायक प्रदीप सरकार को करारी शिकस्त दी।