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    DRDO और आजाद इंजीनियरिंग ने सौंपा देश का पहला स्वदेशी टर्बोजेट इंजन, मजबूत हुआ भारत का एयरोस्पेस इकोसिस्टम

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 07:59 PM (IST)

    DRDO और आजाद इंजीनियरिंग ने भारत का पहला 350 KG थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन सफलतापूर्वक GTRE को सौंपा है। ...और पढ़ें

    भारत ने पहला स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बो जेट इंजन सफलतापूर्वक विकसित किया (फोटो-DRDO)

    भारत ने पहला स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बो जेट इंजन सफलतापूर्वक विकसित किया (फोटो-DRDO)

    HighLights

    1. DRDO-आजाद इंजीनियरिंग ने पहला स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन सौंपा।

    2. भारत स्वदेशी टर्बोजेट इंजन क्षमता वाले देशों के क्लब में शामिल।

    3. यह इंजन क्रूज मिसाइलों, ड्रोन को शक्ति देगा, रक्षा आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने भारत के एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। DRDO की प्रमुख प्रयोगशाला गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) द्वारा डिजाइन किए गए और आजाद इंजीनियरिंग द्वारा निर्मित देश के पहले 350 KG थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन की पहली उत्पादन इकाई सफलतापूर्वक GTRE को सौंप दी गई है।

    इस सफलता के साथ ही भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों के विशेष क्लब में शामिल हो गया है जिनके पास स्वदेशी रूप से एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन को डिजाइन और निर्मित करने की पूरी क्षमता मौजूद है।

    सेना के हथियारों को देगा पावर

    यह कॉम्पैक्ट इंजन मुख्य रूप से एक बार के सैन्य अनुप्रयोगों (Single Use Military Application) के लिए तैयार किया गया है। इसका इस्तेमाल अगली पीढ़ी की क्रूज मिसाइलों, जेट-संचालित लोइटरिंग म्यूनिशन, हाई-स्पीड टारगेट ड्रोन और अनमैन्ड एरियल व्हीकल को पावर देने में किया जाएगा।

    एयरोस्पेस जगत में कॉम्पैक्ट टर्बोजेट तकनीक को सबसे कठिन इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसके निर्माण के लिए एयरोडायनामिक्स, हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग, कंबशन फिजिक्स और टर्बाइन इंजीनियरिंग में महारत की आवश्यकता होती है।

    आधुनिक युद्ध शैली में रणनीतिक बदलाव

    मॉडर्न वॉरफेयर में बिना पायलट या महंगे लड़ाकू विमानों को जोखिम में डाले, लंबी दूरी से सटीक हमला करने की मांग तेजी से बढ़ी है। क्रूज मिसाइलें और लोइटरिंग म्यूनिशन दुश्मन के इलाके में अंदर घुसकर कमांड सेंटर, रडार साइट्स और गोला-बारूद डिपो जैसे रणनीतिक ठिकानों को तबाह करने के सबसे प्रभावी साधन बनकर उभरे हैं।

    अब तक भारत इस श्रेणी के कॉम्पैक्ट जेट इंजनों के लिए काफी हद तक विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर था। इस स्वदेशी इंजन के आने से भारत अब आपूर्ति की रुकावट या प्रतिबंधों की चिंता किए बिना ही भविष्य के हथियार डिजाइन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो जाएगा।

    खबरें और भी

    यह इंजन भारत की लंबी दूरी के लैंड अटैक क्रूज मिसाइल और अग्निवेग जैसे हाई-स्पीड कामिकेज ड्रोन को नई ताकत देगा। जहां प्रोपेलर से चलने वाले लोइटरिंग म्यूनिशन 200 KMPH से कम की गति से उड़ते हैं, वहीं इस जेट इंजन से लैस ड्रोन 400 से 450 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक की रफ्तार हासिल कर सकते हैं, जिससे दुश्मन का रिएक्शन टाइम बहुत कम हो जाता है।

    फाइटर जेट इंजन से कितना है अलग?

    हजारों घंटों तक उड़ान भरने के लिए बनाए जाने वाले फाइटर एयरक्राफ्ट इंजनों के उलट, एक्सपेंडेबल टर्बोजेट केवल एक मिशन के लिए डिजाइन किया जाता है। एक बाल लॉन्च होने के बाद यह इंजन हथियार को उसके लक्ष्य तक पहुंचाता है और हथियार के साथ ही नष्ट हो जाता है।

    इसलिए इसके डिजाइन में दशकों की सर्विस लाइफ के बजाय सादगी, उच्च विश्वसनीयता, कॉम्पैक्ट साइज और कम उत्पादन लागत को प्राथमिकता दी जाती है।

    नीति एवं प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और डॉ. APJ अब्दुल कलाम के पूर्व सलाहकार सिजन पाल सिंह के अनुसार, इस उपलब्धि का महत्व केवल एक इंजन बनाने तक सीमित नहीं है। हालांकि यह फाइटर इंजन नहीं है, लेकिन यह मॉडर्न गैस-टर्बाइन इंजन को डिजाइन और टेस्ट करने के लिए जरूरी ज्ञान आधार को मजबूत करता है।

    कंप्रेसर, टर्बाइन और कंबशन सिस्टम जैसी तकनीकों में हासिल यह अनुभव भविष्य में 100 kN से अधिक थ्रस्ट वाले शक्तिशाली फाइटर इंजनों को विकसित करने का मजबूत आधार बनेगा।

    ग्बोलट एलीट क्लब में भारत की हुई एंट्री

    इस श्रेणी के कॉम्पैक्ट मिलिट्री टर्बोजेट इंजन बनाने की क्षमता अब तक केवल USA (टॉमहॉक मिसाइल), रूस, फ्रांस (SCALP/स्टॉर्म शैडो), ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के पास ही थी।

    भारत की इस कामयाबी ने रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता को खत्म कर पब्लिक लैब्स और प्राइवेट मैन्युफैक्चरर्स के बीच एक विकसित डिफेंस-इंडस्ट्रियल मॉडल की नींव रखी है।

    स्मॉल टर्बोफैन इंजन, माणिक इंजन और कावेरी प्रोजेक्ट से मिले अनुभवों के साथ, यह नया टर्बोजेट भारत को आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पूर्ण एरो-इंजन स्वतंत्रता की ओर तेजी से लेकर जा रहा है।